1534485997355.jpgहमारा यह विशालकाय ब्रह्माण्ड अनेक प्रकार के रहस्यों को अपने में समाय हुए हैं। और इस ब्रह्माण्ड के रहस्य अनेक प्रकार के आचर्यो से परिपूर्ण हैं। उन रहस्यो या आचार्यो कि कलपना भी कोई साधारण मनुष्य मष्तिक नही कर सकता। परन्तु फिर भी कुछ होनहार मस्तिक उन तमाम अदभुत ब्रह्माण्ड के रहस्यों में से किसी ना किसी रहस्य का फर्द फाश करने की भरपूर कोशिश करते हुए अनेक प्रकार के प्रमाण नित्य नए दिन जग जाहीर करते हैं।

यहाँ मैं हर उस मस्तिक्ष से यह पूछना चाहूंगा कि क्या वह प्रमाण हमेशा सौ प्रतिशत सत्य होते है? कई बार वो प्रमाण सत्य होते हुए भी सत्य प्रतीत नही होते। साधारण मस्तिष् कहे या अपने में व्याकूल मस्तिक जिनकी संख्या अमूमन ज्यादा ही होती हैं। उन्हें वो तथ्य या प्रमाण केवल काल्पनिक ही प्रतीत होते हैं। तो क्या वह मस्तिक्ष पूरी तरह गलत साबित हो सकते हैं? या उन साधारण से प्रतीत होते हुए मष्टिक्ष की सोच के पीछे कई असाधारण सोच छुपी हुई है? खैर जो भी हो… कई बार हम सभी ने देखा हैं कि जो प्रमाण किसी सहस्य के उजागर कि दिशा में आज सत्य प्रतीत होते हैं कुछ समय उपरांत कोई और ज्ञानी या असाधारण मस्तिक्ष उस प्रमाण को अपने द्वारा एकत्रित प्रमाणों के द्वारा असत्य सिद्ध करते हुए एक न्य प्रमाण या तथ्यों के साथ जग जाहिर कर देता हैं।

हमारा मस्तिक्ष कई बार अपने तथ्यों को सुलझाये बिना ही परिमाण घोषित कर देता हैं। दरअसल हमारा यह मानव मस्तिक्ष हैं क्या? कही इसमें भी कम्प्यूटर की भांति केवल तथ्यों (data) का केवल संग्रह मात्र ही तो नही?

हमारे इस संसार में कई होनहार और जिज्ञासा से परिपूर्ण मस्तिक्ष मौजूद हैं। परंतु फिर भी अगर कोई ज्ञानी मस्तिक्ष
कोई गलती कर दे तो क्या यह पूरी तरह उसी का दोष होता हैं? आखिर यह गलत जानकारी या असत्य तथ्य उस मस्तिक्ष में आया कहा से? १कही यह तो नही कि किसी चालक या भृमित मस्तिक्ष ने यह असत्य तथ्य उस मस्तिक्ष के सॉफ्टवेयर प्रोग्राम में स्थानांतरण या डाउनलोड कर दिया हो? और खुद सामने आये बिना ही अपना प्रयोग उस मस्तिक्ष के द्वारा कि गई भूलों से खुद के प्रयोग या प्रमाण सत्य सिद्ध कर रहा हो?

खैर जो भी हो! मैं आपसे पूछना चाहूंगा कि अगर कोई दूषित या भृमित मस्तिक्ष आपके सम्मुख आ जाये तो क्या…? किसी न किसी को तो इस दूषित मानव मस्तिक्ष साफ्टवेयर का तोड़ ढूँढना ही पड़ेगा। पर कैसे ?

दरअसल यह एक दूषित सॉफ्टवेर होते हुए भी एक प्रकार का *हानिकारक वायरस* कि ही भांति हमारे मानव मस्तिक्ष के कार्य प्रणाली को प्रभावित करते हुए उसे नष्ट कर सकता है। परन्तु इस वायरस का भी तोड़ हमारे अपने मानव मस्तिक्ष में ही कहि छुपा हुआ है। जिसे बस एक उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता मात्र होती है। यह पूर्णता सत्य है। जी हा आज से ही नही बल्कि अनादि-काल से हमारे अपने मानव मस्तिक्ष के पास ऐसे -ऐसे एंटी वायरस या तोड़ मौजूद है जिंकी कल्पना भी कोई साधारण मानव मस्तिक्ष नही कर सकता।

आज के संदर्भ में अगर हम बात करे तो आज का मानव मस्तिक्ष खुद को कुछ ज्यादा ही तीव्र और तरार *fast* समझने की भूल करता जा रहा हैं। और उन तमाम एंटी-वायरसो को नकारते हुए उन्हें फिजूल का या बेकार का सिद्ध करने पर उतारू होता जा रहा हैं।

क्या आप को ज्ञान है कि आखिर क्या हैं यह एंटी-वायरस? और यह कार्य कैसे करता हैं?

जी इसका जवाब छुपा हैं अधयातम में, जी हा अपने सही ही सुना है। अधयातम! अध्यात्म ही एक मात्र ऐसा जरिया हैं जिसके द्वारा हम उन तमाम दूषित मस्तिक्षो के साथ साथ अपने मस्तिक्ष की भी मरम्मत करते हुए उन समस्त दूषित मानव मस्तिक्षो का इलाज अध्यात्म के एंटी-वायरस के द्वाराकरते हुए उन्हें सुधारा जा सकता हैं।

फिर भी आज का तेज मस्तिक्ष उन सभी आधात्मिक साफ्टवेयरो को नकारते हुए नित्य नए प्रयोग करता ही जा रहा हैं। कई बार सिथिति बेहद ही भयानक रूप धारण कर लेती हैं।और कोइ एंटी वायरस भी फिर उन दूषित मानव मस्तिक्षो के काम नही आ पता। फिर उन तमाम दूषित मानव मस्तिक्षो को उनके दूषित हो चुके साफ्टवेयर को उपचार हेतु मानव मस्तिक्ष साफ्टवेयर इंजीनियर यानि मानव मस्तिक्ष सुधार गृह*mental hospital* जिस को हम पागलखाने के नाम से भी जानते है उन्हें वहा दाखिल, नाम दर्ज करवाना पड़ता हैं। परन्तु ध्यान रहे कि अक्सर लोग रिपेयर कि हुई हर वस्तु को एक शंखा की नज़रो से देखते आये हैं तो क्या?

मस्तिक्ष की दुनिया भी बड़ी अजीब दुनिया हैं साहब। मेरी नज़रो में वह मानव मस्तिक्ष बड़े हे निराले होते है जो बिना वायरस के या गड़बड़ी होने पर अध्यात्म के एंटी वायरस के डोज से काम चला लेते हैं। और स्वस्थ्य महसूस करते हुए प्रसन्नचित रहते है।

आज कल नित्य नई खोज हो रही हैं। और वो नई खोज नई न होते हुए भी बहुत ही प्राचीन होती हैं अध्यात्म के मार्ग पर। कई बार कुछ अपने में कुछ विद्वान् मस्तिक्षो को हम अक्सर कहते सुनते आए है कि यह विषय या यह अधयातम का मार्ग या आध्यात्मिक सॉफ्ट-वेयर बेकार हैं और यह तो महिला मस्तिक्ष का या कायर मस्तिक्षो से सम्बंधित सॉफ्ट वेयर हैं। तो क्या हमें ये बात मन लेनी चाहिए कि महिला मसितक्ष और पुरुष मस्तिक्ष भिन -भिन होते हैं। और उनका सॉफ्टवेयर अलग-अलग ढंग से कार्य करते हैं? या प्रकृति ने उन्हें अलग -अलग ढंग से या अलग अलग विचारो के साथ बनाया हैं। यह तो साधारण मानव मस्तिक्षो कि कोरी कल्पना मात्र हैं साहब।

सदियों से पुरुष मस्तिक्ष ने महिला मस्तिक्ष को अपने से शीर्ण या कम बुद्धि का ही समझा हैं। तो क्या एक मस्तिक्ष केवल लिंग के आधार द्वारा उच्च या निम्न हो सकता हैं?
देखा जाये तो आज पुरुष मस्तिक्ष कुछ हैरान और परेसान सा हैं आखिर क्यों?

सबसे पहले तो मैं यहाँ स्पष्ट कर दु कि कोई भी मानव मस्तिक्ष केवल लिंग के आधार द्वारा उच्च या निम्न कदापि नही ही सकता है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो यह उस मानव कि उसके दूषित मानव मस्तिक्ष का ही दोष है। मेरे इस कथन के द्वारा हो सकता है कि कई दूषित मानव मस्तिक्षो के मन में एक विचार उतपन हो रहा होगा कि आखिर ऐसा क्यों।

तो जानिए जनाब क्यों की आज महिला मस्तिक्ष ने अपने आपको, अपने असाधारण मस्तिक्ष को इस संसार के हर क्षेत्र में स्थापित कर यह साबित कर के दिखा दीया है कि उनका महिला मस्तिक्ष मानव सॉफ्टवेयर किसी भी प्रकार से किसी भी पुरुष प्रधान मानव मस्तिक्ष सॉफ्टवेयर से शीर्ण या कम बुद्धि नही रखता है।

आज महिलाए नित्य नए इतिहास रच रही हैं। क्यों की अगर कोई गलती होती हैं तो दोष किसी मस्तिक्ष का नही
होता बल्कि उस सोच का या उस सॉफ्ट-वेयर का होता हैं जो उसे चलता हैं। दोष उन आकड़ो का होता है जो उसमे जाने अनजाने लोड हो जाते हैं या कर दिए जाते है।

आज जिस प्रकार से महिला मस्तिक्ष ने अपने सॉफ्ट-वेयर का इस्तेमाल कर के दिखलाया हैं और जो इतिहास रचे हैं
उससे यह साबित हो गया हैं कि अगर हम अपने मस्तिक्ष का सही इस्तेमाल करे तो हर किसी मस्तिक्ष को अपने मानव मस्तिक्ष के सॉफ्ट-वेयर पर गर्व हो जायेगा।

इसी प्रकार से ब्राह्मण और मस्तिक्ष के राज भला कोई पूरी तरह से कोई हल कर पाया हैं नही दोस्तों अभी तो केवल शुरुआत मात्र ही हैं। आज हमें एक ऐसे मानव मस्तिक्ष सॉफ्ट-वेयर की अति आवश्यकता हैं जो हम सब कि आने वाली पीढ़ियों को नैतिकता, मानवता और समानता की एक नेक राह पर चला सके।

और उस मानवता से परिपूर्ण साफ्टवेयर या विचारों एवं आदर्शो के ऊपर कोई भी दूषित वायरस अपना कार्य न कर सके। तभी हर एक मस्तिक्ष खुद को स्वस्थ्य और ताज़ा महसूस करते हुए खुद पर गर्व पायेगा।

आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वह भविष्य के लिए ऐसे ही युवा मस्तिक्ष तैयार करे और यह हर एक जिम्मेवार व्यक्ति की ज़िमेदारी हैं मेरे मित्रों।

अगर ऐसा हो पाया तो वह दिन दूर नही जब कोई भी मस्तिक्ष खुद को हिन् और असहाय समझने की भूल नही करेगा। और इस सम्पूर्ण ब्राह्मण पर केवल सुशासन का एक छत्र राज होगा। आखिर वह दिन कब आएगा!!!कब आएगा… वह दिन ?

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

Repost after some editing by Author Vikrant Rajliwal at 17/08/2018 on 11:45 am

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