इस देश की यह कैसे विडंबना है कि अगर व्यक्ति या एक विद्यार्थी अपने जीवन संघर्ष कि परिस्थितियों का सामना करते हुए किसी प्रकार ग्रेजोएट हो भी जाए तो भी सरकार से जुड़ने के लिए या सरकारी नोकरी कि योग्यता परीक्षा का पर्चा भरने के लिए और इस परीक्षा में बैठने के लिए उसे शुल्क देना पड़ता है। क्या सरकारी नोकरी कि परीक्षा में बैठने के लिए केवल विद्या की योग्यता पर्याप्त नही या फिर यहाँ भी संम्पन विद्यार्थि ही परीक्षा में बैठ सकते है और क्वालीफाई होने के उपरांत उनको ही अधिकार है अपने जीवन को सुरक्षित करने का!

अभावग्रस्त वियार्थी या जीवन संघर्षमय विद्यार्थी विद्या प्राप्त कर के भी सरकारी परीक्षाओ में बैठने के लिए या उस परीक्षा के फार्म शुक्ल को भरने के लिए वह आज भी संम्पन व्यक्तिओ की ओर क्यों विवशता से हाथ अपना फैलाने को क्यों विवश है?

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

07/09/2018 at 08:07 am

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