FB_IMG_1530845930916दिखलाती है ज़िन्दगी, हर कदम पर, करीब से अपना रंग।

बतलाती है खून ए ज़िगर कि वो अधूरी दास्तान, हर रंग से अपने।।

दे देती है, दर्द कोई बिछुड़ा फिर से, आता है बदल कर रूप सामने, फिर से वो  दर्द।।।

दहलीज है बिछुड़ती जवानी की, आगाज है बेदर्द बुढ़ापे का।

समा है ऐतबार से, महफ़िल है फिर से आबाद, जो एक दीवाने की।।

हो गया एक रोज़, दीदार ए यार, धड़कने ये खो गई।

लौट आईं महोबत दिल में खोई आरज़ू कोई जाग गई।।

किया है मज़ाक, ज़िन्दगी ने, ज़िन्दगी में दिन ये कौन सा आया।

दहलीज़ है बुढ़ापे की, बिछुड़े यार से, ये सितम, जिस पर मिलाया।।

एक रोज, एक दम से दीदार ये किस का हुआ।

देखते ही जान गया ये दिल, हा इसी से तो प्यार हुआ।।

एक ज़माने के बाद, ये किस ने नज़रो से नज़रो को मिलाया।

करीब दिल के आकर मेरे, ठहरी ज़िन्दगी से बेजान दिल को धड़काया।।

सितम इस दिल पर हो रहा, तोड़ कर बिजलिया, धड़कनो पर, बेदर्द सावन भी रो रहा।।।

इंतेहा दर्द ए दिल, महोबत जो अब हो गई, ज़माने की है
रुसवाई।

बरस रहे आँख से आँसू, बात है दिल कि दिल को जो दिल ने बतलाई।।

आई है बन कर, सावन की बहार, बे-मौसम ज़िन्दगी मेरी जो बंजर बियाबान।

मुस्कुराहट है लबो पर गुलाबी उसके, जाग गए देख कर,
करीब से दिल के सब अरमान।।

दर्द है जुदाई का, जख़्म उसके भी जख्मी सिने में।

कहना चाहती है वो भी कुछ, सुनना चाहता हु में भी कुछ।।

कर रहे दीदार दोनों, बिछुड़े जो एक ज़माने से।

सदियों से खमोश लब, बेड़िया अब भी ज़माने से।।

लकीर है  मिटने लगी, वख्त की यू ही आज जो अचानक से।

याद है उल्फ़त के अब भी वो दिन, बढ़ने लगी धड़कने ज़िन्दगी की जब अचानक से।।

बदला-मौसम, समा बदला, बदल गए सब नज़ारे।

आ जाती है याद ज़िन्दगी, तमाम अधूरी वो बहारे।।

नादां उम्र से नादां धड़कने, नादां थे वो अफ़साने।

हो गए ज़माने से जो, नादां थे वो फ़साने।।

याद है…

याद है अब भी, सावन कि वो बात।

नीरस थी जब ज़िन्दगी, पूरे चाँद की वो रात।।

बेजान मौसम में, एक रोज जान आ गई।

सुन-सान गली महोले कि धड़कने जाग गई।।

तन्हा थे लम्हे, अजीब से जो खामोश, उनसे जो एक अहसास हुआ।

देख कर खुशनुमा मौसम, फिर मुझ को जो विशवास हुआ।।

चारो ओर एक खामोशी सी छा गई।

महौले में मेरे रहने को एक हूर आ गई।।

एक इत्तफाक किसमत ने मेरे साथ किया।

घर के सामने मेरे, उसने एक घर लिया।।

देख कर उस को, ये दिल धड़क गया।

जाने को करीब उसके, ये मन मचल गया।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न, मौसम भी मदहोश हो गया।

हर अदा थी कातिल उसकी, दिल ए दीवाना कही खो गया।।

गिरती थी हुस्न ए शबाब से उसके बेबस इस दिल पर बिजलिया तब।

चलती थी इठला कर जब, भूल जाता था ये दिल भी धड़कना तब।।

कतार घर के सामने, मनचलो की उस के लगने लगी।

करने को दिदार ए हुस्न, जंग उन-में कोई खूनी मचने लगी।।

देख कर नज़ारा, ये बर्बादी का अपनी, मन मेरा कूछ परेशान हुआ।

करता हूं महोबत मैं भी उस-से, जान कर हाल ए दिल ये दिल हैरान हुआ।।

करता हूँ दिदार ए हुस्न, नज़रे बचा कर खिड़की से रोज़ अपनी।

जीता हूँ, मरता हूँ, तन्हा, घुट-घुट कर किस्मत से रोज़ अपनी।।

नही आती है नींद बेदर्द रातो से दर्द ये आज-कल।

सताती है याद ए दिलरुबा, सितम ये हर-पल।।

दीवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।

हर कोई है जलने को आतुर, परवाना ए हुस्न ये जहां सारा लगता है उसका।।

सुर्ख गुलाबी लबो पर निकलती है लगा कर लाली वो जब।

लग जाती है दीवाने उन मनचलो में उसके कोई होड़ तब।।

एक शोर सा मच जाता है भरे बाजार में तब।

छुरिया चल जाती है कत्ल हो जाता है भरे बाजार में तब।।

देख कर नज़ारा ए हुस्न वो मदमस्त उसका, वख्त भी ठहर जाता है।

एक दिदार ए सनम के खातिर, हर कोई इस जहां में मचल जाता है।।

देख लेती है, उठा कर जब भी, मदहोश निगाहें वो अपनी,
बेबस है दिल ए दीवाना धड़क से धड़क जो जाता है।

महोबत जताने को सनम से अपने ए पाबंदियों वो बेहिंतिया तड़प जाता है।।

न जाने क्यों एक रोज महोबत ने रंग अपना दिखलाया।

हुस्न को है इश्क से काम, नाम ए महोबत जो दीवाने को बुलाया।।

देख कर नज़दीक से बदन वो क़ातिलाना-हुस्न उसका,
बुरा हाल था।

शराबी निगाहों से वॉर, वो मन-मोहक उसके शारीरिक उभार, जीना अब मेरा दुशवार था।।

धधक रहे थे अंगार नाजुक वो गुलाबी लब उसके।

झुलस रहा था दीवाना, तपिश जो गुलाबी-लबो से हर लम्हा उसके।।

एक रोज नज़रे-चार, अनजाने ही, जो उनसे हो गई।

कर के नज़दीक से दिदार ए हुस्न, धड़कने ए दिवाना जो खो गई।।

वो आए करीब, इस दिल के, वो एक नशा था।

देखा नशीली निगाहों से उसने, उनमे एक नशा था।।

कर रही थी दिदार ए यार जो नज़रे नज़दीक से।

उठा था दर्द ए धड़कन, देखा जो उनको नज़दीक से।।

अक्सर होती है, मुलाकाते उनसे, मुस्कुरा कर आता है हुस्न ए यार वो करीब।

जगा कर आरज़ू, खोई कोई तमन्ना, खो जाता है कसम, फिर वो नसीब।।

अरमान दिल के अब जाग गए, एक ही पल में दीवाना जो जहां सारा पा गए।

खिल उठे महोबत के गुल, गुलिस्तां ए महोबत जो रेगिस्तान से दिवाना पा गए।।

मुस्कुराता है देख कर, हर अदा से अल्हड़ वो हुस्न जब।

करता है वॉर, जख़्मी अरमान, बेबस इस दिल पर जब।।

भूल जाता है धड़कना, ठहर जाती है धड़कने ए दिल वही पर जब।

बेजान सी है जो धड़कने, धड़कना चाहती है वो जब।।

लव है खामोश से एक थरकन सी जो उनमे आई, चाहते है कुछ कहना शायद हम दोनों ही जब।

आलम है बेबसी भरा अहसास ए दिल, खामोशी जो साथ अपने लिए, रह जाते है खमोश से हम दोनों ही जब।।

आती है दिल-रुबा वो, होते है दीदार ए यार, बरसते है तीर ए हुस्न, शराबी निगाहों से अब अक्सर।

धड़कता-दिल, धड़काते है हुस्न ए यार, और भी खामोशी से बेदर्दी अब अक्सर।।

होता है इज़हार ए महोबत, नज़रो से जो दीवाना, वक़्त बे वक़्त जो उनसे सितम अब अक्सर।

करते है गुफ्त-गु, साए में नज़दीक से महोबत, अहसास जो उनके अब अक्सर।।

आलम ए बेबसी, वो इज़हार ए महोबत, तरसता है सुनने को दीवाना जो अक्सर।

यकीन ए महोबत वो ख़्याल ए तन्हाई, सिहर जाता है ख़ौफ़ से दीवाना जो अक्सर।।

दीदार ए यार, ये समा ए ऐतबार, मिलता है तन्हाई में नसीब से अब अक्सर।

तीर ए महोबत, ये जख्म ए दिल, लगते है रुसवाई से सरेराह, अब अक्सर।।

नही मालूम है गहराई,  सितमगर ए सनम, काफ़िर उस हसीना के दिल ओ धड़कनो की क्या है दीवाना।

धड़कते-दिल तड़पती धड़कनो को सकूँ एक लम्हा भी वो लेने नही देती, दर्द ए दिल ये दर्द है धड़कनों पर दीवाना ।।

जो है महोबत, दीवाने से उस को, नाम ए महोबत, बन्द लबो से ग़ुलाबी वो अपने क्यों बोल नही देती।

जख़्म है दिल के, हर जख्मो पर वो मरहम, महोबत से अपने, धड़कनो को दिल के सकूँ क्यों नही देती।।

महक जाता है समा, बदलता है रंग, शर्म ओ हया से चेहरे का जो उसके गुलाबी।

पुकारता है दर्द ए दिल, नाम ए महोबत वो नाम उसका, देखा जब भी मदहोश निगाहों में जो उसकी शराबी।।

धड़कती जवां धड़कने, उफान एक उनमे आ गया।

यकीन ए दीवाना, सनम के अब वो करीब आ गया।।

किया मज़ाक, ए वख्त जो हाल ए दिल, एक रोज़, धड़कनो से सनम को जब सुनाया।

समझा सनम ने दिल-लगी, ए मुकदर, दिल-चिर दीवाने ने,
फिर अपना दिखलाया।।

बदला रूप, फिज़ाओ ने, हालात जो खिलाफ, हो गए।

पहले झुके पहेलु में वो, फिर लिप्ट के  रो दिए।।

किया इजहार ए दोस्ती, महोबत का उसमे कोई नाम नही।

महोबत तो है ए दोस्त मग़र, मक्कारी कोई उनमे नही।।

बन कर दोस्त, आती है दिलरुबा, जब भी कोई नज़दीक,
नज़रो के  सामने।

एक आरज़ू,वो लव्ज़ ए महोबत, दब जाते है दिखती है जब भी वो नज़रो के सामने।।

रहता है इंतेज़ार, एक अहसास, वो पल है महोबत, जिस पल उसे भी हो जायगी।

तड़पेगा-दिल, एक रोज़, ए महोबत उस सितमगर का, जिस पल महोबत उसे भी दीवाने से अपने हो जायगी।।

इंतज़ार ए हुस्न से हुस्न ए दीवाने कई मनचलों का हाल बेहाल होते देखा।

दीदार ए हुस्न से बांधे टक-टकी, नज़रो में अपनी, अंजाम कइयो का बुरा देखा।।

चीर दी है सरे-राह कइयों ने फड़कती नसें, शरीर की अपने, हुस्न ए शबाब के वास्ते।

फोड़ दिए है सरे-राह, कइयो ने बेमतलब सर अपने,
आपसी तकरार के वास्ते।।

हाल ए दिल दीवाने का भी, बेहाल नज़र आता है।

देख कर दीवाने ए सनम, मनचले वो चौखट पर उसकी दिल तड़प जाता है।।

मौसम है वीरान बिन दीदार ए सनम, ये कैसी वीरानी।

हालात है खिलाफ, ये दर्द ए महोबत, ये कैसी ज़िन्दगानी।।

ज़िन्दगी है उजाड़ मेरी किस तन्हाई में खो गई जो।

सनम है सितमगर मेरे, क्या किसी गैर की हो गई वो।।

जख्म ये गहरा, टूटे दिल पर, एक रोज, बेहूदा कैसा पड़ गया।

देखा जो सनम को अपने, न जाने क्यों ये दिल तड़प गया।।

आ रहे थे सनम कहि से शायद कहि पर वो जा रहे थे।

आईना ए महोबत, वो अक्स नज़रो में, किसी गैर का,
महोबत एक दूसरे से दोनों फरमा  रहे थे।।

गुजर गए न जाने मौसम कितने, कितने ज़माने बीत गए।

तड़प ए दिल, तन्हाइयों से दीवाना, जख्म न जाने टूटे दिल
पर कितने पड़ गए।।

तड़प टूटे-दिल की टूटी धड़कनो से जो, अब बर्दाश नही होती।

सताता है ख़्याल ए सनम, बिन सनम दर्द ये ज़िन्दगी, आवाज़ दिल के वीराने से कोई अब नही होती।।

बदमिजाज जो मौसम, एक रोज सरेराह हो गया।

अहसास ए ज़माना, हर कोई यहाँ खो गया।।

वख्त की लकीर पर, एक हादसा जो अब हो गया।

आशिक एक दीवाना जो सनम का, सनम को कहि ले गया।।

तन्हा छोड़ दीवाने को जो तन्हाई में, उड़ गए पंछी महोबत के न जाने कहाँ वो।

आई न याद दीवाने की जो अपने, तन्हा मार गए जो एक दीवाने को बेदर्दी वो।।

करी है महरबानी जो बेबस अपने एक दीवाने पर,
खून ए ज़िगर, छोड़ दिया, चौखट पर मेरी तन्हा एक पैगाम।

पड़ा है जख्मी, तन्हा सा वही चोखट पर मेरी, तन्हा सनम का जो आखरी वो एक पैगाम।।

लिपटा है एक गुलाब उस से, काँटे हज़ारो रुसवाई के कई,
चुम रहा है बेबसी से धूल चोखट कि मेरी, तन्हा सनम का वो एक पैगाम।

टूटे-दिल की टूटी धड़कने, भूल गए जो अपना नाम, ठहर गयीं उखड़ती हर सांस, जाम है रगों का जो बहता उफ़ान।।

काँपते हाथ, थरथराती जुबां, मासूम थे वो अरमान।

पढ़ रहे महबूब का जो अपने, आखरी था वो फरमान।।

चिर दिया इश्क़ ने दिल अपना जो निकाल, नम आँखों से पढ़ कर तन्हा सनम का वो तन्हा एक पैगाम।

हर लव्ज़, वो हर अक्षर थे उसके, सुना रहे हाल ए दिल, दर्द सनम का जो एक दास्तान।।

नम आंखों से लिखी है उन्होंने जो इल्तिज़ा एक आख़री।

दर्द ए दिल कर रहे है दर्द बयां, अश्को के उस पर, निसान वो आखरी।।

टूटा जो दिल टूट कर बिखर गए सब अरमान, टूटे इस दिल के जितने थे जो आखरी।

झलक रहा, दर्द ए दिल, दर्द हर लव्ज़ वो अक्षर थे उसके जो आखरी।।

लिखा था खून ए श्याही से दर्द ए दिल वो नम आंखों से उसने दिल का जो अपने हाल।

पढ़ रहा है, दीवाना उसका, ए दिल धड़कनो को अब जरा तू अपने ले सम्भाल।।

हो गए जो दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब  मुझ को तुम याद।।

जा रही हूं छोड़ कर, चौखट पर तुम्हारी तन्हा एक पैगाम।

पढ़ लेना तुम उस को, लिपटा हो जिस से टूटा एक गुलाब।।

याद न करना कभी, समझना कोई ख़्वाब।

टूटेगी नींद जब तुम्हारी, टूट जाएगा यह ख़्वाब।।

अलविदा ए यार, आखरी, रखना अपना ख़्याल।

दिख जाएगा जल्द ही ज़माने में, तुम को भी हसीन कोई ख़्वाब।।

करे महोबत दिल से जो, देना तुम उसका साथ।

भूल जाना मुझ को तुम, दे देना उस को यह गुलाब।।

जा रही हुं, अब दूर तुमसे, होना न तुम हताश।

जी लेना ज़िन्दगी, करना न अब मुझ को तुम याद।।

तड़प गया दिल, बिखर गई, टूट कर हर सांस।

पढ़ कर महबूब का अपने, आखरी वो फरमान।।

टूटा जो दिल एक दीवाने का,  उठती है दिल से एक फ़रियाद।

खड़ा है राह ए सनम, अब भी दीवाना, करता है हर लम्हा जो सनम को याद।।

दिल में है महोबत उसकी, हर धड़कन में है उसका एक इंतज़ार।

रुकी है ज़िन्दगी, ठहर गयी हर सांस, हर सांस में अब भी है कायम उसका एक अहसास।।

तड़पता दिल, टूटी धड़कने, ले रही है, दीवाना ए सनम से अहसास ए महोबत का जो इम्तेहां ।

आरज़ू एक महोबत, बेताब है हर सांस, दे-देगा दीवाना, अब भी ए महोबत, महोबत का हर इम्तेहां।।

जला देगा, सितम ए इश्क, मिटा देगा ए महोबत खुद को अब ये दीवाना।

धड़कता दिल, बन्द सीने से जो, हुस्न ए यार का, अब भी है सनम का अपने वो दीवाना।।

दास्तान ए महोबत, जख्मी ये दिल जो सरेराह हो गया।

हुआ जो दीदार ए सनम, दीवाना ए सनम फिर से कहि जो खो गया।।

तड़प ए दिल, बेबस है बेहिंतिया जो एक दीवाना,
अंजाम ए महोबत जो अंजाम ए दीवाना दिखता नही।

राह ए सनम, एक रोग है महोबत, जो एक आशिकाना,
दर्द ए दिल क्यों दर्द ए दीवाना अब मिटता नही।।

दम तोड़ती ये महोबत, सुनाती है हर धड़कन से अब भी महोबत का महोबत से फिर वही तराना।

अहसास ए जुदाई साथ ये दीदार ए सनम, खिले एक अरसे से गुल तो खो गया कहि वीराना।।

धड़कता है दिल, तो धड़कनो से एक आवाज़ होती है।

हर धड़कन, नाम ए महबूब, दीवाने के साथ होती है।।

इंतज़ार है एक धड़कन, वो राह है सुनी, खड़ा एक ज़माने से जहाँ जो सनम-दीवाना।

आरज़ू है एक अधूरी, थामे है हाथो में अपने अब भी जो गुलाब वो वर्षो पुराना।।

विक्रांत राजलिवाल द्वारा लिखित।

(Republish After removing some typing error at 22/092018 at 04:25 am)

One thought on “🌹 पहली नज़र। (सम्पूर्ण महोबत की एक दर्द भरी दास्तां)

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