अक्सर सितमगर एक हसीना का, दीदार किया करता हूँ।

आती है पर जब वो सामने, तो मुह फेर लिया करता हूँ।।

देखना तो चाहता हूँ उसको मैं जी भर, मगर न जाने उसके हाव भाव से, क्यों डर जाता हूँ।।।

उस सितमगर हसीना की शख्सियत भी कमाल लगती है।

चेहरे पर उसके हमेशा आग ग़ुसे की दिखती है।।

न जानें चमक से उस आग की क्यों ठिठर जाता हूँ।

ख्यालो में मगर, हाल ए दिल उससे, अक्सर बतियाता हूँ।।

उस समय मुझ में भी कुछ हिम्मत जाग जाती है।

सुनाने को हल-दिल, तबियत मेरी भी मचल जाती है।।

फिर देख के हाव-भाव वो चहरे के उसके, दम तोड़ महोबत मेरी जाती है।।।

उसकी उस आग से चेहरे कि ए दिल क्यों जल जाता हूँ।

करता हूँ महोबत, बेहिंतिया जब उससे, हाल ए दिल ये उससे अपना, क्यों कह नही पाता हूँ।।

चाल हर बार क्या जहरीली सी कोई, चल जाती है वो। मिलती है अक्सर तन्हाई में तो घण्टों मुझ से बतियाती हैं वो।।

आती है ए वक़्त, पर सामने जब वो सब के, तो मुझको भूल जाती हैं।

जख्मी ये दिल इस तरह, सरेआम वो मेरा कर जाती है।।

दिखा के चहरे की आग वो अपने, इस दिल पर जख्म

दे जाती है, इस दिल पर जख्म दे जाती है…इस दिल पर जख्म दे जाती है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
29/09/2018 (अति लघु से लघु तंकन त्रुटि सुधार उपरांत पुनः प्रकाशित। / Short reproduction from minor to small tuning error correction)

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