Writer & Poet Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari & Article's by Vikrant Rajliwal

Sep 28, 2018
Vikrant Rajliwal (विक्रांत राजलीवाल) -स्वतन्त्र लेखक-

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🎻 पैगाम ए महोबत।

वख्त ए ज़माने ने आज, जख्म ये कौन सा दीवाने को दिया।
चिर के दिल, ख़ंजर बिना, रगों में बहता लहू जमा दिया।।

हुआ गजब, ये आसमां भी बरस गया।
गरज के वो भी, टूट कर बरस गया।।

देखा जो जनाजा, अश्को से, आशिक का एक।
रो दिया दिल, ठहर गई धड़कन हर एक।।

चल रही माशूका उसकी, उसके जनाजे के साथ।
झलक रही महोबत, खड़ी है अब भी वो उसके साथ।।

लाई थी हाथो हाथो में ,आँचल से छुपाके गुलाब कई।
पड़ रहे है जख्म दिल पर, हर काँटे उन गुलाब से कई।।

चाल थी मतवाली उसकी, आखो से नमी बरस रही।
दर्द ए दिल, हर लम्हे से बहुत, लबो पे मुस्कान झलक रही।।

बदल गया रंग ए आसमां, दर्द उसका झलक गया,
देख के रंग ए लहू, हाथो में उसके जो महेंदी सा।

मिल गया आकर के वी भी उससे,
उसका भी रंग ए लहू महेंदी सा।।

कर गए रुख्सत,सब लोग दीवाने को जहा।
खड़ी है महबूबा,अब भी बगल में,
दफ़न है दीवाना उसका जहा।।

बरसा रहा लहू असमा, ये जमीं भी पुकार रही।
देख के ये हाल ए महोबत, खुद महोबत भी रो रही।।

बिजली टूट रही, जिगर पर, वफ़ा का वहा पैगाम दिया,
खोल के बन्द शीशी ए ज़हर, आशिक का फिर नाम लिया।

पी लिया प्याला ए ज़हर, फिर उसने सरेआम,
कब्र ए दीवाने से लग के अपने, दम अपना तोड़ दिया।।

दम तोड़ने से पहले, तड़प ए महोबत, बरस रही।
दबी-आरज़ू थी आखरी, बुझती नज़र से झलक रही।।

टूटता दम, रुकती वो सांसे आख़री, उसने थाम लिया।
ख़ंजर से चिर के सीना, नाम ए महोबत, वो माशूका,
जो कब्र ए दीवाने पे उसने लिख दिया।।

FB_IMG_1520143631536 विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Republish at 28/09/2018)

2 thoughts on “🎻 पैगाम ए महोबत।

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