Writer & Poet Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari & Article's by Vikrant Rajliwal

Oct 13, 2018
Vikrant Rajliwal (विक्रांत राजलीवाल) -स्वतन्त्र लेखक-

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जख़्मी-अहसास।

घिर आई रात फिर से चाँदनी, गुजरे जो साये से उनके दीवाने।

राह ये सुनसान सी कोई, दिख रहे गुलिस्तां भी जाने-पहचाने।।

आलम ये रुसवाई का जो, सिने से लगाये, दर्द ए दिल, तन्हा ये अश्क, अधूरी सी यादे वो उनकी, अब भी जो उनके दीवाने।

रंग ए लहू ये लाल आसमां, रुकी-धड़कने, उखड़ी सी सासे, गुजरे चौखट से ख़ामोश उनकी, दर्द ए दिल अब भी जो उनके दीवाने।।

कसक ए टूटे दिल, टूट गई जो धड़कने, कदम ख़ामोश से अपने।

सुना रहे हाल ए दीवाना, जख्म ए दिल, अब भी जो उनके दीवाने।।

न मरहम लगे, न दुआ कोई, कत्ल-अहसासों पर नासूर जो अपने।

नासूर हर जख्म, उभरे दर्द अहसासों के दिल से जख्मी, अब भी जो उनके दीवाने।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)FB_IMG_1517903342512.jpg

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