Writer & Poet Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari & Article's by Vikrant Rajliwal

Oct 13, 2018
Vikrant Rajliwal (विक्रांत राजलीवाल) -स्वतन्त्र लेखक-

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दर्द ए महोबत

हो गया हैं फ़ना, एक दीवाना जो कहि,
सनम से अपने, बिछुड़ जाने के बाद।

बिखर गयी हैं चाहते, अश्क़ जख्मो पर जो कहि,
टूट गयी सांसे, दिल उसका टूट जाने के बाद।।

हो गया है दफ़न, परत समय कि में जो कही,
रह गए निसान ए इश्क्क़ बाकी, उसके चले जाने के बाद।

जल गयी है चिता, मासूम-अरमानो की उस के जो कहि,
एक अहसास ये जुदाई, ये चीखती तन्हाई बाकी, उसके खो जाने के बाद।।

एहसास है धड़कनो को, खामोश धड़कनो का, ज़ुल्म धड़कनो पर उस के जो कहि,
सो गया जो मुसाफ़िर, राह ए महोबत, अपनी लूट जाने के बाद।

चाहत हैं ज़िन्दगी, मजबूरी अब भी ये महोबत, चल रही जो जिंदगी जो कहि,
उखड़ रही जो सांसेFB_IMG_1517903513149.jpg, एक दर्द बन्द सीने में कहि, धड़कने
उस की रुक जाने के बाद।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Republish at vikrantrajliwal.com)

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