Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's

Poetry, Shayari, Gazal, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

October 14, 2018
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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बेपरवा सनम।

FB_IMG_1539512576949देखा था ख़्वाब कभी दीवाने ने एक।
जगमगाते सितारो से हसीन,
वो था चेहरा एक।।

परवान थी महोबत, चाँद की रात में एक।
छा गए फिर क्यों उनपे वो बादल काले,
हो गए जुदा वर्षो से मिले वो पल में एक।।

हुस्न की बहार से, इश्क मेरा छली हुआ।

खाया खंज़र सिने पर, इश्क मेरा नीलाम हुआ।।

महोबत के बज़ार में , बिकती नही महोबत।

वफ़ा-ऐतबार से, ज़िंदा हैं वही महोबत।।

बिक जाती हैं फिर भी सरेराह वफ़ा
करती हैं बेवफ़ा कोई जब महोबत।।।

सकूँ ए दिल जो मेरा अब लूट गया।

दाग धड़कनो पर ये कैसा पड़ गया।।

चला तीर निगाहों से कही।

छली ये दिल मेरा अब हो गया।।।

भरी हैं जो इस दिल में वफ़ा।

मिलते हैं अक्सर जमाने मे बेवफ़ा।।

ज़ख्म दिल के जो दिख गये।

नासूर बन कर फिर उभर गये।।

सकूँ ए दिल जो हसीना ने एक
सरेराह मेरा जो लूट लिया।

धड़कनो पे दे कर निशान ए जुदाई
ए तन्हाई, तन्हा जो जमाने मे,
मुझ को छोड़ दिया।।

महोबत दिलरुबा कि,चिर के दिल जख़्मी करे।
दिखा कर आईना ए महोबत,
ऐतबार से फिर बेवफाई करे।।

खाया धोखा प्यार से, तन्हा जो अब हो गया।
रोशनी हैं बेहिंतिया,
जुदा साये से फिर भी अपने हो गया।।

हुस्न की सुराई से, अमृत कलश ,चुरा लेंगे।
कदमो में ऐ दिल-कश हसीना,
चिर के दिल अपना हम बिछा देंगे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)

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