FB_IMG_1539507949918.jpgआज का मनुष्य जैसा आज दिखता है या जिस व्यक्तित्व का परिचय अधिकतर मनुष्य उपलब्ध करवाते है वो व्यक्तित्व उनके जीवन के आरम्भ से उनके व्यक्तिव से सम्बंधित नही था।

व्यक्तिक अगर उज्ज्वल हो स्वार्थ रहित हो तभी उत्तम कहलाता है एव ऐसे व्यक्तित्व का परिचय एक विशवास से उत्तपन होता है और यह विशवास उतपन होता है एक सार्थक कार्य से, अपने से निम्न या कमज़ोर व्यक्तिव के व्यक्तिओ को अपना एक स्नेह से पूर्ण सानिध्य उपलब्ध करवाने से, उनको अपना अनमोल मार्गदर्शन उपलब्ध करवाने से।

इसके विपरीत अगर मनुष्य का व्यक्तिव मलिन हो उससे अश्लीलता की दुर्गंध अति हु। तो ऐसा व्यक्तिव अपनी दुर्गंद से सम्पूर्ण संसार को एक विनाश की ओर अग्रसर करने को उतारू रहता है।  ऐसा मलिन व्यक्तिव का व्यक्तिव आरम्भ में एक बार को जरूर हर किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। परंतु ऐसे मलिन व्यक्तिव का अंत अति दयनीय एव भयंकर होता है। ऐसे मलिन व्यक्तिव का व्यक्ति जब तक जीवित रहता है तब तक उसका मन अशांत ही रहता है।

प्रिय मित्रों यहाँ सार यही है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से उज्ज्वल या मलिन व्यक्तिव के साथ  नही जन्मता है। बल्कि जन्म के समय एक नवजात शिशु के कण कण में एक अलौकिक प्रकाश विराजमान रहता है। जिसके प्रभाव से शायद ही कोई मनुष्य अछूता रह पाया हो।

अब सवाल यह उत्तपन होता है कि फिर कमी कहा रह जाती है कि जो एक दिव्य प्रकाश से प्रकाशित नवजात के रूप जन्मे व्यक्ति के व्यक्त्वि या भाव व्यवहार पर समय के साथ एक मलिनता की परत क्यों स्थापित हो जाती है या वह अश्लीलता की और न चाहते हुए भी आकर्षित हो कर अपने दिव्य व्यक्तिव का पतन कर अपना विनाश तक क्यों कर देता है।

इसका जवाब भी हमारे अपने व्यक्तिव में ही कहि छिपा हुआ है। जी हां इस प्रशन का जवाब हमारे अपने व्यक्तिक में ही कहि छुपा हुआ है। परंतु इस प्रशन का उत्तर जानने से पूर्व हम सबको यह जानना अधिक जरूरी है कि अन्न जल के अतिरिक्त आखिर हमारे जीवन की सर्वप्रथम प्राथमिकता है क्या?

क्या हम केवल भौतिक वस्तुओं एव अपनी तुच्छ शारीरिक वासनाओ के विपरीत कभी कुछ सोच व समझ सके है या कभी अपनी तुच्छ वासनाओ के विपरीत कुछ सोचने की हिम्मत ही कभी जुटा पाए है?

मित्रों वासना कई प्रकार की हो सकती है जैसे भौतिक वासना, शारीरिक वासना एव हमारी अज्ञानता वश उपजी हमारी भृमित मानसिक वासना। सर्वप्रथम हमारे मानव देह में उत्तपन वासना मानसिक, शारीरिक एव भौतिक हो सकती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण विषय यह है कि क्या हम अपने चारित्रिक एव मानसिक रूप से उन अनजान वासनाओ का सामना करने हेतु तैयार है या हमारा चरित्र एव व्यक्तिव इतना मजबूत है कि इन मानसिक, शारीरिक एव भौतिक वासनाओ को पराजित कर एक दिव्य विजय पताका अपने अंतरात्मा में स्थापित कर सके।

मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन काल ज्ञान अर्जित कर्ता है। कई बार यह ज्ञान हमे सहज ही प्राप्त हो जाता है और कई बार हम पर्यसम्य होते हुए भी उचित ज्ञान अर्जित कर पाने में पूर्णता असमर्थ होते है। इसके भी कई कारण हो सकते है जैसे सही दिशा या सही गुरु का अभाव। इसके अलावा कई बार हमारे मानव मस्तिक्ष पर यह संसारी वासनाएं अत्यंत हावी हो जाती है जिसके कारण हमारे सोचने समझने की क्षमता पर भी गहन प्रभाव पड़ जाता है एव हम न चाहते हुए भी अपनी तुच्छ वासनाओ के वशीभूत हो कर अपना पतन खुद अपने ही हाथों कर बैठते है।

इस समस्त संसार में कोई भी व्यक्ति अपना एव अपने चरित्र का पतन नही चाहता बशर्ते उसको इस बात का एहसास जरूरी है कि चाहे उसे इस भौतिक संसार की प्रत्येक दुर्लभ वस्तु ही क्यों न प्राप्त हो जाए या अपनी हर प्रकार कि वासना की तृप्ति के लिए वह जितना भी प्रयत्नशील रहे फिर भी अपने जीवन के अंत तक उसकी तृप्ति नही हो सकती!

इसके लिए सर्वप्रथम हमे अपने वास्तविक व्यक्तिव को जानना अत्यंत आवश्यक है। ऐसा हो सकता है कि शुरुआत में हमे अपना वास्तविक व्यक्तिव कुछ भयभीत करें या हम में उसे स्वीकार करने की क्षमता न हो। फिर भी अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए, अपने प्रिय प्रियजनों कि आत्मसंतुष्टि के लिए हमे अपने वास्तविक व्यक्तिव को स्वीकार करना ही पड़ेगा एव जिस दिन इस समस्त संसार के प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण में खुद को खुद के वास्तविक व्यक्तित्व को स्वीकार करने की क्षमता उतपन हो जाएगी उसी दिन इस संसार मे एक नए सूर्य का उदय स्वम् ही हो जाएगा। जिसकी नीव आत्मस्वीकृति के एक प्रबल विशवास से प्रेरित होगी उससे टिकी हुई होगी एव हम एक नया बदलाव, खुद में खुद के व्यक्तिव में महसूस कर पाएंगे। जिसके फल स्वरूप हमारे सम्पूर्णलीन विचार भी शुद्ध हो अपनी दिव्य आभा से इस समस्त संसार को प्रकाशमान कर पाएंगे।

परन्तु मित्रो यह जितना सरल प्रतीत होता है उतना सरल है नही, युगों युगों से हम मनुष्य हर एक नए बदलाव से कतराते रहे है। फिर भी जब भी कभी किसी महानुभव ने खुद के वास्तविक व्यक्तिव को स्वीकार कर खुद के व्यक्तिव में एक सकारात्मक बदलाव किया है तो उन्होंने न केवल खुद को अपितु समस्त संसार को अपने उस अनोखे व्यक्तिव की दिव्य आभा से प्रकाशमान कर सकारात्मक रूप से प्रभावित भी किया है।

आज फिर से यह संसार ऐसे ही किसी एक महानुभव के उस अनोखे व्यक्तिव कि प्रतीक्षा कर रहा है जो खुद को खुद के व्यक्तिव को स्वीकार करते हुए फिर से एक बार इस समस्त संसार को अपनी दिव्य आभा से प्रभावित कर इस संसार के प्रत्येक कुविचारो एव दुर्व्यवहारों पर एक सकारात्मक प्रहार कर सके। एव खुद को आत्मशांति प्राप्त करवाते हुए समस्त संसार को उस दिव्य आत्मशांति का एक दुर्लभ अनुभव प्रदान कर सके।

क्या आप तैयार है खुद के वास्तविक व्यक्तिव को स्वीकार करते हुए आत्मशांति का दुर्लभ अनुभव प्राप्त करने के लिए?

समाप्त।

स्वतन्त्र लेखक एव विचारक विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित एक भाव जो सत्य से प्रेरित है।

Republish at vikrantrajliwal.com

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