Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतंत्र लेखक-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।-स्वतंत्र लेखक-

Oct 15, 2018
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

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एक बदलाव।

20181015_093529.pngयुवा! जी हा युवा,  युवा जो हर सभ्य समाज का भविष्य कहलाते है। युवा जिसकी शक्ति का लोहा हर ज़माने ने माना है। वही युवा आज हताश और निराश क्यों नज़र आता है। योग्य और योग्यता से परिपूर्ण होते हुए भी वह क्यों मज़बूर है? क्या यह हमारी थरथर हो चुकी या कई दशको से भृष्ट व्यवस्ता की देन है?

आज हर युवा प्रतिभा को तलाश है एक ऐसी व्यवस्ता की यहाँ उसे भी उसकी योग्यता के अनुरूप उचित स्तान प्राप्त हो सके। जहाँ उसके भी कर्म साकार हो सके। इस जर्जर व्यवस्ता को चलाने वाले ये नही जानते कि आने वाले कल में खुद वह भी और उनके ही कारण खुद उनकी भी नस्ले इस भृष्ट व्यवस्ता का शिकार हो हताश और निराश हो जाएंगी। आज के युवा की हताशा का सबसे बड़ा कारण है कि आज हर कोई उनकी कमजोरी एव बेरोज़गारी का अपने अपने तरीके से फायदाउठा रहा है। ऐसे कई तरह के प्रलोभन बाज़ार में सोशल मीडिया में मौजूद है जो उनको  भृमित  कर उनके भविष्य से खिलवाड़ करते हुए नज़र आते है। और जब हकीकत से उन तमाम युवाओ का सामना होता है तो वह एक दम से हताश और निराश हो जाते है। कई युवा तो अपने अनमोल जीवन को समाप्त तक करने का विचार बना लेते है और कई अपना जीवन समाप्त भी कर देते है।

आज ज्यादातर लोग केवल मुनाफा कमाने के लिए ही जीवन जी रहे है और इसके लिए वह हर अनैतिक उपाय अपनाने को सदैव ततपर नज़र आते है। इस तरह से वह हमारे जीवन से, हमारे अपनो के जीवन से ही नही अपितु सम्पूर्ण सभ्य समाज के भविष्य से एक घिनोना खेल खेलते हुए नज़र आते है।

इस समस्या का समाधान आज  के युवाओं को अपने बुजुर्गों के साथ मिल कर खुद तलाशना है या फिर वह भी इस प्रकार के भ्र्ष्टाचार से जुड़ कर भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा देंगे और अपनी आने वाली नस्लो को मजबूर और बेबसी में जीवन व्यतीत करने के लिए उन्हें इस अनन्त अंधकारमय कुँए में धकेल देंगे। अगर ऐसा हुआ तो यह वही मिसाल बन जाएगी कि जिस डाली पर बैठे थे वही काट दी और फल तो मिला पर ज़हरीला।

यह लड़ाई है कई दशको से कमजोर व्यवस्ता से, यह लड़ाई है खुद से खुद के लिए, यह लड़ाई है अपनी आने वाली नस्लो के लिए।

जय-हिन्द!

स्वतन्त्र लेखक एव विचारक श्री विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)

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