Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। -स्वतंत्र लेखन-

Oct 16, 2018
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal (स्वतँत्र लेखन)

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दर्द ए महोबत

20181016_204253.jpgबदला मौसम, बदली फिजाएं, बदल गया ये जहाँ सारा,
बदला ना मिज़ाज़ ए इश्क़, इस दिल-धड़कनो में है जो सदियों पुराना।

धड़कती हैं धड़कन, तो धड़कता हैं दिल, धड़क जाता हैं
ये जहाँ सारा,
आती हैं याद समन की, भूल जाता हैं धड़कना, ये दिल हैं
बेबस हमारा।।

आलम हैं मदहोशी का, कोई महक सी साँसों में हैं समाई।
देख कर हुस्न मद-मदस्त वो उनका,
दर्द ए दिल, रग रग में हैं महोबत, खुमारी सी हैं कोई समाई।।

देख रहे हैं चाँद को ,पलको से हैं, वो जो छुपाये।
घिर आई घटा फिर से कोई,
रेशमी जुल्फे है, ए महोबत उन्होंने जो लहराई।।

बरस रही शराब कोई, गुलाबी लबो से उनके।

जल रहा दिल ए दीवाना, क़ातिल हर अदा से उनके।।

हो जाता हैं क्यों हाल ए बेहाल ए दिल, नही है नादाँ जब ये इश्क हमारा।

चलते हैं तीर मदहोश-निगाहों से, तड़प जाता हैं ये दिल बेबसी से हमारा।।

सच ही कहते हैं आशिक वो दीवाने, है जो अब भी कायम सदियों पुराने…

खेल नही ये कोई असां, एक प्याला है ज़हर का जिसे कहते महोबत है।

दरिया हैं धधकती एक आग का, ए आशिक ए परवाने जलना है महोबत में सनम की और जलते ही जाना हैं बस जलते ही जाना है बस जल जाना हैं।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

( Republish after a very short typing error correction at vikrantrajliwal.com)

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