Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतंत्र लेखक-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।-स्वतंत्र लेखक-

Oct 19, 2018
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

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💥 राम जन्म।

एक थे राजा बहुत महान।
नही थी पर उनके कोई संतान।।

रहती थी उनकी एक चिंता यह भारी,
कैसे बढ़ पाएगा अब उनका महान वंश।

अभी तो है वो जिंदा, चल रही है श्वास उनकी मगर,
क्या आ पाएगा कभी इस धरा पर उनका भी अंश।।

देख राजा को अपने यू चिंतामग्न,
आए एक ऋषि और सोचा एक उपाय।

करके हवन किए उतपन जो उन्होंने कुछ फल।
हुआ सन्तोष कि मिलेगा राजन को अब अपने बल।।

किया शंका का निवारण उन्होंने सबकी,
दिया ज्ञान का फिर जो उन्होंने एक सन्देश।

फल नही है राजन ये कोई मामूली।
खिलेगी इससे सुनी बगिया की हर डाली।।

सुन कर वचन दिव्य अमृत के ज्ञानी ऋषि से,
हुआ सन्तोष उनको अत्यंत, खिल उठा जीवन खाली।।।

अब राजन को कुछ विचार सा जो आया।
फल लेकर ऋषि से वो उनको रानियो को दे आया।।

दिव्य फल पाकर समीप, चारो रानी भी हरषाई थी।
उनके सुने जीवन मे सुगन्ध बहार कि जो अब आई थी।।

यह सब था विधान विधि का।
मायाजाल था स्वम् ईष्वर का।।

करने को नाश पाप का, धरा पर अवतार धर्म का आना था।
ये हवन ये फल ये विधान विधि का तो एक बहाना था।।

अब दुष्टो का अंत दूर नही।
अब सन्तो को किसी का डर नही।।

वह दिन भी प्रभु कृपा से जल्द आ गया।
आसमान से जब बादल काला छट गया।।

राम जन्म का दिन अत्यंत ही निराला था।
हर कोई था प्रसन्न और,
प्रसन्ता ने सबकी दुख को मार डाला था।।

किया स्थापित धर्म जो धरा पर, स्थापित आदर्श व्यवहारों से उनके हुआ।
हर बाधा झुक कर छट गई स्वम्, आदर्शो से उनके उदय सवेरा दिव्य हुआ।।

आखिर हाथो उनके ही संहार दुष्टो का हुआ।
खिला पुष्प मर्यादा का एक और उसका विस्तार हुआ।।

नही भूलना चाहिए कभी हमे।
राह दिव्य जो मिली उनसे हमे।।

आदर्श जीवन मर्यादित व्यवहार, धर्म जीवन से मिला उनके जो हमे।
हर बाधा को कर के पार, सयंम जीवन से विजय पताका,
हर्षोल्लास दिया जो हमे।।

आज हज़ारो वर्षो के उपरांत, भूल गया मर्यादा क्यों अपनी आज का स्वार्थी इंसान।
साथ पापी का देकर फैलाया जो भर्ष्टाचार, देख मासूमों निदोषों की पीड़ा भी नही जागता क्यों उनका धर्मो ईमान।।

कहा गया वो पुष्प धर्म (ईमानदारी, मर्यादा) का, खिलाया जो श्री राम ने था।
कर अधर्म का नाश पूण्य से, मर्यादा की माटी में, सूर्य एक नया जीवन से सबके जलाया था।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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(Republish)

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