Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। -स्वतंत्र लेखन-

Oct 24, 2018
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal (स्वतँत्र लेखन)

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बेरुखिया।

FB_IMG_1517410644112कर गए नज़र-अंदाज़, फेर कर मदहोश नज़रो को वो अपनी।

ज़ला दिया दिल ए दीवाना, कातिल हर अदा से जो अपनी।।

कर के क़त्ल निगाहों से दीवाने का मदहोश अपनी, मुस्कुराता हैं हुस्न वो बेबाक।

छोड़ के तन्हा बेपरवाई से, ज़ख्म ए दिल, बेदर्दी टूटे दिल पे दे जाता हैं हुस्न वो बेबाक।।

दिखती नही राह कोई, बच के जो गुज़र जाए दीवाना।

हर राह हैं सनम से मेरी, बच के कैसे, गुज़र जाए दीवाना।।

आशिक है महोबत से उनकी, जख़्मी जो मेरे अरमान।

देखा हैं नूर ए हुस्न का जलवा, कातिल हैं उनकी हर चाल।।

जख़्मी अरमानो से हैं ख़्वाब कई, हर ख्वाब में रहती हैं वो मेरी जान।।।

हर अदा होती हैं हुस्न की संगीन।
करता हैं मुलाकाते अक्सर,
ख्यालो में उनसे दीवाना, अपने रंगीन।।

कहते हैं आशिक वो पुराने, रोग ए महोबत है सदियों पुराना।

चलता हैं तीर जब निगाहों से, बेबस हो जाता हैं दीवाना।।

कर के नज़र-अंदाज़ ज़माने कि वो रुस्वाइया।
खड़ा हैं चोखट ए सनम, ले रहा नाम ए महोबत,
अब भी उनका दीवाना।।

थाम के धड़कता-दिल, उखड़ती-सांसो से दीवाना।
ले रहा है नाम ए महोबत, चौखट से उनके
अब भी  उनका दीवाना।।

❤ रुख से पर्दा, अपने हटा दे, चाल ये कोई नही
मरता हैं तेरे नाम से, अब भी तेरा दीवाना।।।

विक्रान्त राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish at vikrantrajliwal.com)

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