लहू कि हर बून्द बह जाए जो आज जख़्मी हर जख्मों से मेरे।

हर ज़ख्म नासूर बन कर फट जाए जो आज टूटे दिल के मेरे।।

धड़कते धड़कते धड़कना भूल सकती है धड़कती धड़कने, तड़प धड़कती धड़कनो से है कायम, धड़कती धड़कनो में मेरे।

दग़ा हर लव्ज़ से झलकता जो अक्स एहसास का टूटा टूटा सा है कायम, कशमकश टूटती हर सांस में मेरे।।

जिंदगी हर लम्हा लहूलुहान सी है, लहूलुहान से हर एहसास है मेरे।

सितम हर उम्मीदों से है जिंदा जिंदगी, दफ़न टूटती उम्मीदों से हर एतबार है मेरे।।

गुज़रते हर लम्हो से गुज़र न जाए ज़मीर, अब भी है जिंदा जो जमीर कहि ज़मीर में मेरे।

दरारें तड़क कर तोड़ चुकी है एतबार से हर आईने, अक्स दिखता नही खुद का अब उन आइनों में मेरे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(photocollage_20181025215925385.jpgRepublish)

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