❤ जिंदा है धड़कने, सांसे जो जिंदगी, अहसास ए ज़िन्दगी जो जिंदगी में मेरी,
अब भी कही अपनी खामोशी से जिंदा है।

खामोश है अल्फ़ाज़, हर लम्हा जो जिंदगी, खून ए श्याही जो कलम में मेरी,
अब भी कही अपनी बर्बादी से जिंदा है।।

रुसवा है जो कलम एक बग़ावत से मेरी, दम तोड़ती हर आरज़ू, एक मजाक है बेदर्द, बेपरवा जो इस ज़माने के वास्ते।

जख़्मी है जो हक़ीक़त एक बेनकाब सी मेरी, नासूर हर जख़्म, बेदर्द है बहुत, हर जुल्म ओ सितम, ये ज़िंदगी के रास्ते।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित 24/01/2018(wednesday 11:49am)

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