नही सोचा था एक रोज़ ए वक़्त वक़्त ऐसा भी आएगा।

भूल के दिल धड़कनो को अपने बेहिंतिया तड़पायेगा।।

ये तारीख़ अनहोनी कोई ये आसमां आज फट जाएगा।

बरस रहे शोले याद कोई नाम बन्द जुबां पर आ जाएगा।।

जला दिया अक्स ए यार लहू इन फड़कती नसों से जो अपने।

एक आरज़ू सितम है महोबत जिंदा सांसो को जो तोड़ दिया अपने।।

चले आए भूल कर मौसम वो सुहाना ज़िंदगानी से जो अपने।

एक चाल वक़्त है महोबत हसीन वो ख़्वाब जो तोड़ दिया हमने।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish)

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