लगाये बैठे हैं धड़कनो पे पहरा जो।

करते हैं कत्ल मदहोश निगाहों से जो।।

बेदर्दी-सनम बेबस-दीवाने का अपने जो।

सितम ए महोबत जल रहा दिल ए दीवाना जो।।

पैगाम ए महोबत चीर के जख्मी-दिल दे रहा अश्को से जो।

महबूब ए महोबत रूठ गईं एक ज़माने से जो।।

एक पुकार खामोश वो अल्फाज कर रहे फ़रियाद,
टूटी धड़कने सुलग रहा जिस्म ए दीवाना जीते जी जो।

हो गया दफ़न, बेदर्द-वो-समा ए रूठे सनम,
गम ए ज़िन्दगानी ये गुनाह ए महोबत से हो गया फ़ना जो।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

vikrantrajliwal.com

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