नफ़रत है लव्ज़ ए महोबत से दीवाने को अब बेहिंतिया।

नफ़रत है हर एक उस आरज़ू-अधूरी से दीवाने को अब
बेहिंतिया।।

एक मुकम्बल अंजाम से पहले जिसे खुद महोबत ने तोड़ दिया।।।

नफरत है हर एक काफ़िर उस हसीना से दीवाने को अब
बेहिंतिया।

थाम के हाथ महोबत का महोबत से तन्हा फिर दीवाने को जिसने छोड़ दिया।।

नफ़रत है हर एक अदा ए हुस्न उस जहरीली से दीवाने को अब बेहिंतिया।

दिखा कर ख़्वाब ए महोबत एक धोखा वो रंगीन सरे-राह बेदर्दी से जिसने जिसे फिर तोड़ दिया।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish)

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