निकला हैं साया कई वर्षो के बाद एक अंधेरे को चीरता हुआ।

अक्स अपने को भुला कर बेरंग जो एक रौशनी ज्ञान कि अब फिर से ढूंढता हुआ।।

खड़े हैं पहरेदार निर्दयी जो अँधेरे अज्ञान के हर ओर ,
घेर रहे हैं फिर से उसे क्यों करने को अंधकार मे फिर से दफन।

पूछ रहे हे पता कब्र का खुद उसकी वो उस से, खड़े है साथ अपने वो लिए उसका जो कफ़न।।

दास्तां है मिसाल ए हिम्मत कि अब भी जो अधूरी।

रुकी सांसे, ठहरी सी धड़कने, ये ज़िन्दगी हैं रौशनी से मेरी अब भी जो अधूरी।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(Republish)

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