1541662131382.jpgचल रही है किश्ती, ढूंढ़ने को किनारा कोई,
उफान ए समंदर से हौसले टूटते हुए।

फंसे है मुसाफ़िर साथ अनजाने कई,
राह ए उमीद साथ एक लिए हुए।।

देख के रोशनी, चाँद से, उठती है तरंगे कई,
हर तरंग साथ अपने, जान कई लिए हुए।

उमीद है, जल्द ही थम जायगा, तूफ़ान ए जज़्बात,
हर जज़्बात दुआ ए ज़िंदगी साथ अपने अपनो की लिए हुए।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(Republish)

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