CollageMaker_20181026_085522327.jpgजीवन से इतना मिला जिसकी कभी कोई आशा नही करि थी। जिसकी प्राप्ति के लिए हर क्षण तड़पता रहा, काटो से कर के महोबत अपने ह्रदय अग्नि से जलता रहा।

आज होता है एहसास की मिलो चलने के उपरांत भी आज भी मैं वही खड़ा हूँ। फर्क सिर्फ इतना है जिंदगी के सफर की शुरुआत में मेरे समुख दो दोराहे थे। और आज भी में उन्ही दोराहे पर ही खड़ा हु।

शुरुआती एहसास बेहद घुटन भरे थे और दोराहे के दोनों मार्ग जिंदगी से मिलते हुए प्रतीत होते थे। इच्छा से उतपन संकल्प, आत्मस्वाभिमानपूर्वक जीने की चाह से ज़िन्दगी के उस मार्ग का चयन किया जिस पर हर क्षण जलते हुए, टूटती धड़कनो से खंडित होते विशवास को बेचैन श्वासों से किसी प्रकार थामे हुए। हर कदम से जलते हुए बस चलता गया चलता गया चलता ही गया…

आज लगभग एक डेड (1.5 दशक वर्ष, वर्ष 2000 से अब वर्ष 2018 तक) दशक वर्षो के उपरांत अपने उस चयनित आध्यात्मिक एव शिक्षा के मार्ग से होते हुए अनेको अनेक दोराहो से गुजरते हुए हर क्षण एक नया जीवन अनुभव करते हुए। न जाने क्यों अब हौसले जवाब दे जाते है कि है कि बस बहुत हो गया जीवन से संघर्ष, बहुत हो गया स्वम् से स्वम् का संघर्ष, अब समय आ गया है अपनी पराजय स्वीकार करते हुए रुक जाने का, अब समय आ गया है अपनी जान, जीवन से भी प्यारी अपनी कलम को अलविदा कहते हुए स्वम् ही अपने चयनित दिव्य सच्चाई के मार्ग के साथ स्वाहा हो जाने का!

जनता हू कलम से दूर हो कर नही जी पाऊंगा, बिन कलम के शायद जीते जी ही मर जाऊंगा। परन्तु…?

जीवन और समय हमेशा एक समान नही रहते, हर दुख के पीछे एक सुख आपकी राह निहार रहा है। एव सुख तक पहुचने के लिए कुछ तो त्याग करना ही पड़ता है। कभी यह त्याग मेहनत मांगता है तो कभी संघर्ष, तो कभी कभी हर दोराहे को नकारते हुए आप स्वम् अपना मार्ग बनाते हुए जीवन का हाथ विश्वाशपूर्वक थाम लेते है और आपके सम्पूर्ण जीवन संघर्ष सहज ही आपके जीवन से समाप्त हो जाते है और जीवन एक नए संघर्ष के साथ आपके समुख उपस्थित हो जाता है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
20/09/2018 at 07:15 am
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