एक नही दो नही भरा जो खाली ये याम ए मेरे साकी जो अब मुझको।

पि लेने दो मुह से लगा कर बोतल ये सरेआम शराब की ए मेरे साकी अब मुझको।।

खून बन के दौडेगी रंग ए लहू सी दहकती ये सुर्ख शराब फड़कती हर नब्ज़ में अब मेरे।

हट जाओ ए खामोश नज़रों हर खोई आरज़ू लौटेगी IMG_20180712_074905_439.jpgहर एक जाम ए लहू से वीरान फिज़ाओ में अब मेरे।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(शुक्रवार 2 फरवरी 20:43 pm on wordpress site)

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