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आज रात कयामत बरसेगी या तो मिल जाएगा रूठा वो महबूब मुझ को या ये जान मेरी अब जाएगी।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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कर गया रुख़सत जमाने को वो आखरी,
दीदार ए सनम एक आरज़ू के साथ।

उठा था चौखट से तेरी, बेगानो कि जो तरह,
ए महोबत वो जनाजा था मेरा एक बेदर्दी के साथ।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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दर्द ए ज़िन्दगी से हो कर के खफ़ा, जा रहा है जो,
ए महोबत वो है मुकदर मेरा।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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पी लेते है तन्हाई में आती है जब जब याद तेरी।
नही है तू पास मेरे ए सितमगर ए सनम,
जी लेता है फिर भी दीवाना, देख कर अधूरी तस्वीर तेरी।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
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मिटा दी वो सुर्ख लकीरे अश्को से अपने ए बेवफ़ा झूठी महोबत कि तेरे।

खिंची थी बड़ी शिदत से धड़कनों पर बेदर्दी से जो वक़्त ने मेरे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
👉
नही सोचा था ए वक़्त इम्तेहां ए ज़िन्दगी ज़िन्दगी में ऐसा भी आएगा।
ठुकरा कर ख़ुद को ये दिल धड़कनों को अपने अक्स ए महबूब को चाहेगा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

पुनः प्रकाशित एव संग्रह के रूप में प्रथम बार
18/11/2018 at 10:35 am

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