IMG_20181102_081045_576इस समस्त संसार मे हर शिशु का है जन्म सिद्ध यह अधिकार।
शिक्षा दीक्षा ज्ञान संस्कार मिले उसको भी विकास का अपने अधिकार।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा (स्वम् के द्वारा) लिखित उपरोक्त काव्य पन्ति विक्रांत राजलीवाल ( स्वम् के) जी का एक सत्य अनुभव, एक एहसास, एक बदलाव का प्रयास है जो उनके निजी जीवन संघर्ष से प्रमाणित एव प्रेरित है कि कैसे एक अबोध बालक (श्री विक्रांत राजलीवाल) अपनी कच्ची उम्र (2004, 18 वर्ष) में ड्रग्स के नशे से संघर्ष कर के उसे अपनी इच्छाशक्ति से अपने गुरुजनो के आशीर्वाद से पराजित करते हुए अनेक प्रकार की विकट एव जटिल परिस्थितियों का दृढ़ता के साथ सामना करते हुए न केवल ड्रग्स के नशे से मुक्त हुए अपितु अपने एक अनपढ़ जीवन को अपने सत्यकर्मो से परिवर्तित करते हुए वर्ष 2009 से 12वी कक्षा एव वर्ष 2013 में दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट भी हुए।

एव अपने जीवन संघर्ष एव सभ्य साहित्य अपनी शिक्षा से प्रेरणा लेते हुए वर्ष 2016 जनवरी में अपनी प्रथम काव्य पुस्तक *एहसास* जिसका केंद्र बिंदु हम सब के सभ्य समाज से मानवता के लिए समाजिकता एव मानवता की कठोर होती भाव भावना पर एक प्रहार की कोशिश मात्र है लिखी एव प्रकाशित करि। एव अब ऑनलाइन तकनीकी का प्रयोग करते हुए आप सभी प्रियजनों के समक्ष अपने ह्रदय भावो को निरंतर साँझा करते हुए एक और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के प्रयास हेतु पर्यसम्य है।

यह सब जितना सरल अब प्रतीत होता है वास्तव में यह उतना सरल कभी भी नही रहा। इस जीवन मे सामान्य जनो को भी एक अवसर हेतु संघर्ष करते हुए अत्यंत जटिल प्रकार की विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है एव एक ड्रग एडिक्ट चाहे उसे 15 से 16 वर्ष की कच्ची उम्र में उसकी अज्ञानता के कारण धोखे से ड्रग्स के नशे का सेवन करवा दिया गया हूं या जिसने केवल उस कच्ची उम्र में एक आध बार ही उस नशे का सेवन किसी व्यवस्क जानने वाले के साथ ही क्यों न किया हो परन्तु एक बार वह पुनर्वासकेन्द्र (नशा मुक्ति केंद्र) में पहुच जाता है तो उसका जीवन ही परिवर्तित हो जाता है। संक्षेप में इसको इस प्रकार से कह सकते है कि जो अवसर (शिक्षा एव खेल कूद) कभी सहेज ही उपलब्ध थे वह अब एक युद्ध के समान प्रतीत होते हुए एक कटु सत्य के समान उसके समक्ष अपने होने का एक एहसास उसे उसकी हर एक रुकती श्वास से करवाते है।

इस जीवन मे सही समय पर अपने विकास हेतु कभी भी कोई भी एक अवसर एक पुनर्वासकेन्द्र से डिसचार्ज बालक या व्यक्ति को सहेज से प्राप्त नही हो पाता। एव हर एक अवसर अपने आप मे दर्द की एक अनकही वह दास्तां होती है जिसके पीछे छुपे हुए होते है तो सिर्फ और सिर्फ उसकी बेबसी एव किसी क्रूर के शोषण से पीड़ित उसके दर्द से भरे हुए अश्रु निसान।

आशा करता हु इस लेख के लिखने के वास्तविक कारण तक आप सभी प्रिय पाठक पहुच सके।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

18/11/2018 at 15:20 pm
(पुनः प्रकाशित तंकन त्रुटि में सुधार उपरांत पिछली बार 12वी के स्थान पर 10वी अंकित हो गया था।)

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