हर बरबादियों को बता अपनी अब क्या मैं नाम दु,
हर एक बरबादी भी कहा थी नसीब में जो मेरे।

हर दर्द ए जिंदगी जब खुद दवा बन जाती है न,
नासूर हर ज़ख्म और भी नासूर हो जाते है तब।।

ज़िन्दगी जब ज़िन्दगी से सरेराह डर जाती है न और मौत भी आइना हक़ीक़त का अक्स जब नजदीक से दिखाती है।

हर अहसास हक़ीक़त के ज़िन्दगी को डराते है जब,
लड़खड़ाते हर कदमों से साए जिंदगी के अंधेरो में खो जाते है तब।।

रचनाकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
23/07/2018 at 11:00 am
View on vikrantrajliwal.com

(Republish)20181015_094654

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