एक चाह, एक ख़्वाहिश, अब भी है आरज़ू कहि टूटे इस दिल मे,
सितम ये महोबत अभी बाकी है।

ज़ख्म ए दिल ये तन्हा महोबत, अब भी है उम्मीद ए दीदार उनका,
चाहत ये महोबत अभी बाकी है।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(पुनः प्रकाशित)

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