चिर कर जख़्मी दिल उफ़नती धड़कनों से अपना,
देखता है ख़्वाब कोई फिर से वो सुहाना।

ढूंढता है अक्स ए यार सुनी नज़रो से अपना,
अब भी वो सदियों पुराना।।

आया न पैगाम ए यार, बैठा है सुनी चौखट पर उनकी,
देख रहा है राह ए महोबत, अब भी एक अर्से से दीवाना।।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
(पुनः प्रकाशित)CollageMaker_20181026_085522327

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