बढ़ा कर हाथ मित्रता का मित्र, करि मित्रता सरेराह स्वम् हमसे जिन्होंने जो एक विशवास से।

तोड़ विशवास किया घात विशवास से, छोड़ तन्हा बढ़ चले फिर मुस्कुराते हुए वो हमे विशवास से।।

20181015_200234स्वतन्त्र लेखक एव कवि नज़्मकार विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

(पुनः प्रकाशित)

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