Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतंत्र लेखक-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।-स्वतंत्र लेखक-

Dec 18, 2018
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

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किन्नर।(एक जीवनी) *एक अधूरा भाव*एक अधूरा प्रोजेक्ट।

नमस्कार प्रियजनों, आज आप सभी मित्रजनों के साथ कुछ भाव साँझा कर रहा हु। कुछ महीने पूर्व इसी वर्ष 2018 में एक परिचित जानकर महानुभव ने मेरी लेखनी से प्रभावित हो कर अपनी जीवनी लेखन की जिम्मेवारी मेरे सपुर्द्ध करि थी। जिसका विषय *किन्नर* एक अति संवेदनशील भावो पर आधारित था। उनके आग्रह करने के उपरांत मैने इस जटिल विषय पर लेखन कार्य प्रारंभ भी कर दिया था। एव उसके उपरांत मैंने उनसे उनके जीवन प्रारम्भ से सम्बंधित बहुत से अति संवेदनशील एव कठोर प्रशन भी वट्सअप अप्प के जरिए जानने चाहे। परन्तु आज कई महीने गुजर जाने के उपरांत भी जब उनकी ओर से कोई भी प्रत्युत्तर प्राप्त नही हो सका तो आज मै आप सभी से अपने उस लेखन कार्य को साँझा कर रहा हु।

क्योंकि मैं नही चाहता कि मेरा वह लेखन कार्य जिसे एक दिव्य कार्य के समान मैंने प्रारम्भ किया था व्यर्थ हो जाए। आशा करता हु कि शायद आप सभी मेरे उन भावों को समझ सके जो मैं आपका अपना रचनाकार मित्र विक्रांत राजलीवाल समझाना एव बताना चाह रहा हु। तो अब आप सभी प्रियजनों एव प्रिय पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है मेरे द्वारा लिखित अति संवेदनशील विषय *किन्नर* (एक जीवनी) पर लिखी गई वह प्रारम्भिक चन्द पनतिया जिसके उपरांत उन महानुभव की ओर से मेरे द्वारा पूछे गए उन अति संवेदनशील प्रश्नों का कोई भी प्रयुतर प्राप्त नही हो पाने के कारण मेरा यह लेखन कार्य आज भी वही पर तन्हा खड़ा है।
नीचे की ओर अब आप सभी मित्रजनों के समुख प्रस्तुत है वह शुरुआती भाव वह अधूरा लेखन कार्य जो आज भी…

किन्नर (एक जीवनी)

मौसमी बदलाव के साथ बदल जाते है हालात। क्या आपने रेगिस्तान वियावन में कोई ओस बून्द देखी है। अगर आप रेगिस्तान से कभी गुजरे होंगे तो आपको उस एक ओस बून्द का महत्व भी अवश्य ही ज्ञात होगा। जो एक भटके हुए मुसाफिर एव एक जिंदगी की ख़्वाहिश रहने वाले व्यक्ति के लिए किसी ईश्वरीय एक वरदान के सम्मान ही अनमोल होती है। प्रकृति ने हर एक जाति किस्म अत्यंत ही सोच विचार कर ही बनाई एव उनमें एक जीवन प्राणों का संचार किया है। या फिर आप इसे इस प्रकार से भी कह सकते है कि जिन भी हालातों में आज तलक जो भी जाति किस्म प्रकृति में प्रकृति से उपज कर जीवंत हो सकी है। चाहे वह इंसान हो, पेड़ पौधे हो या फिर जीव जंतु। वह उस परम्परमेश्वर ईष्वर एव हम सबकी जीवनदाता मनमोहक प्रकृति कि दृष्टि में अपना एक ख़ास महत्व रखते है। तभी तो उनमें जीवन स्वरूप जीवन प्राण ऊर्जा का एक संचार नज़र आता है। जी हां मैं भी एक ऐसी ही प्रकृति कि प्यारी एक अनमोल उपज हु। आप सोच रहे होंगे कि कौन हूं मैं? तो यहाँ मैं आप सभी महसनुभवो से सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगी कि…

मैं भी हु वरदान प्रकृति का।

मुझ में भी है निसान प्रकृति का।।

दिल धड़कता है सांसे चलती है मेरी भी।

बहती हु समान धारा कोई पवित्र सी मैं निर्मल।

कर के हर बाधाओ को पार कहलाई हु मैं किन्नर।।

धन्यवाद।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित

(यह वह लेखन कार्य था जो आज भी किसी प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में तन्हा खड़े हुए न जाने किसकी प्रतीक्षा कर रहा था जिसको आज आप सभी महानुभवों तक पहुँचा कर मैंने एक जीवंत रूप देने का एक प्रयास किया है।)

18/12/2018 at 08:19am

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