स्वीकार अस्तित्व व्यक्तिव का वास्तविक हम अपने कभी जो कर ना सके।

भृम जीवन में जीवित हर श्वास साथ में, जीवन हम अपना जो जीते रहे।।

बदल ना सके भावो को दूषित, व्यवहारों को भृमित कभी जो हम अपने।

बदलते रहे स्वम् को बदलते भावो से व्यवहारों को दूषित जो हम अपने।।

ह्रदय कक्ष से स्थापित भाव नेक, ज्वलित दिव्य अग्नि एक, सत्य प्रकाश निल गगन से जो अपने।

राह नेकी पर बढ़ते कदम, छीलते घाव, टूटते पथिक घात छलित विश्वासों से जो अपने।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

05/11/2018 at 19:57 pm

Advertisements

Leave a Reply