याद हैं अब भी गुजरा वो ज़माना, देखा था खोया अक्श नज़रो में उनकी अपना जब वो वर्षो पुराना।

रात थी वो चाँद की, आशिक था महोबत से उनकी
यह सारा ज़माना।।

रहता था उफ़ान धड़कनो में जब मेरे।

बजता हो साज कोई, जैसे साँसों से मेरे।।

उनकी वो हर एक अदा अब भी हैं याद मुझ को।

वख्त बे वख्त वो इतराना, तीर शराबी निगाहों से चलाना,
अब तक हैं याद मुझ को।।

वो मौसम, वो सर्द रात, वो थी मेरी तन्हाई की बात।

साया था पीपल का एक साथ मेरे, वो थी उनसे मेरी जुदाई की रात।।

अब तक हैं याद मुझ को…

देखी थी जब राह ए सनम, धड़कती तो कभी टूटती अपनी हर धड़कन के साथ।

वो आये नही थे देने को जब दीवाने का अपने, जो अब भी धड़कनो में कहि मेरे मेरा साथ।।

निकलती थी एक आह, गुजरते हर लम्हे के साथ।

आलम था बेदर्द बेहिंतिया, आया था जो एक बेबसी के साथ।।

खड़ा था दीवाना जो राह ए सनम, साए से अपने लिपट कर,
खो गयी राह ए मन्ज़िल, एक दर्द, वो महबूबा किसी गैर के साथ।

वख्त गुजरा, समा गुजरा, गुजर गया वो जमाना, चली गयी थाम के हाथ,
देखता रह गया जो तन्हा दीवाना, वो किसी गैर के साथ।।

अब तक हैं याद मुझ को…

खड़ा हैं अब भी वही उसका दीवाना, साए से उसी पीपल के साथ।

देख रहा हैं राह सुनी, अब भी न जाने किसकी वो, उसके चले जाने के बाद।।

अब तक हैं याद मुझ को…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

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