आज भी जब कभी किसी कमसिन उम्र के बालक को किसी पार्क के एक तन्हा से बेंच या इसी फुटपाथ पर नशे का सेवन करते हुए देखता हूं तो मेरे अंतरात्मा अंदर तक घायल हो जाती है।

सत्य है यह भाव कि मैं उसी समय उनके लिए अपने सच्चे ह्रदय से एक आत्मशांति की प्रार्थना अपने उस परम परमेश्वर से कर लेता हूं।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित

28/01/2019 at 10:42am

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