आज आपसे यू ही कुछ कहने का, कुछ एहसासों का एहसासों से एहसास साँझा करने की इच्छा हो रही थी।

क्या कहूँ ऐसा? क्या लिख दु ऐसा? किस प्रकार लिख दु अपने वास्तविक एहसासों की वास्तविकता की मेरे ह्रदय के एहसासों की तड़प आप तक पहुच सके?

कभी कभी मैं स्वम् को एकदम से ही अत्यधिक थका हुआ, विपरीत परिस्थितियों में स्वम् को न जाने क्यों ठगा हुआ? इस भरे संसार मे स्वम् के होने का कोई एक एहसास तलाशते हुए, स्वम् से कहता हूं कि अभी नही, हा अभी नही रुकना है तुझ को, बेशक से खड़ा है तू कही भूलभुलैया में, बेशक से है किश्ती डवांडोल तेरी किसी उफ़नते भवँर में, पर अभी नही रुकना है तुझ को, सत्य है जो अभी रुक गया तू तो निच्छित ही मर जाएगा। सांसे तो चलेगी जरूर तेरी मगर अंदर से कही कोई एहसास तेरा जरूर मर जाएगा।

एहसास! एहसास जो जिंदगी है। एहसास जो केवल एक एहसास ही नही है अपितु तेरे जीवांत होने की एक निशानी है। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि जल्द ही वह समय भी आ जाएगा जब मुझ को न चाहते हुए भी रुकना पड़ेगा। हर भूलभुलैया के मध्य स्वम् को भूलना पड़ेगा। अपनी डवांडोल किश्ती को उफ़नते हर भवँर से बचाते बचाते स्वम् अपनी किश्ती से उस उफ़नते भवँर में कूदना पड़ेगा।

शायद इस प्रकार से मैं स्वम् को मारते हुए कुछ जीवांत महसूस कर सकू। अपनी हर धड़कती धड़कनों को तोड़ कर शायद अपनी कुछ धड़कने सुन सको। अपनी हर पल मरती तो कभी टूटती सांसो से स्वम् के दम तोड़ते एहसासों को थाम कर स्वम् से कह सकू, अभी नही! हा अभी नही। अभी थोड़ा और चलना है, अभी थोड़ा और चलना है…हा अभी थोड़ा और चलना है।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
30/01/2019 at 18:50 pm

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