जीवन के हादसे, कब खेल बन गए।

ये खेल हादसों के, अब सच्चाई बन गए।।

बेहोशी से हो गयी, हार पर हार।

हर बार हो गया, दिल पर वॉर।।

एहसास चेतना का जब हुआ।

बन गया खेल ये फिर हादसों का।।

न जाने कमी क्या हर बार रह जाती है।

रोशनी दिख कर कहि क्यों खो जाती है।।

क्यों यह जमाना मुझ से अब जीत गया।

जल कर भी हर लम्हा, तन्हा जो अब रह गया।।

वो एक कोशिश जीने की ज़िन्दगी को, क्या एक हादसा था।

बदलना खुद को जो चाहा तो क्या वो एक हादसा था।।

कोशिश अंजाम तक न जो कोई भी पहुच पाई।

बदलना खुद को मुझे दहलीज़ ए मौत पर जो ले आई।।

हार गया है बेगाना (विक्रांत राजलीवाल), टूट गया जो दम खुद से।

हर चाल, वो हर शह, ये बेरुखी है जो खुद से।।

हर कदम, वो हर निसान, ये जख्म है जो मेरे लहू-लुहान,

खिंची थी लकीरे, जो चंद, आजमाइशे वो जिंदगी की अपनी।

मिट चुकी है दम तोड़ती, हर जिंदा ख्वाहिशो से अपनी।।

मिसाल ए हिम्मत, बढ़ता वो कदम,सख्त है बेहिंतिया, वो बेड़िया, बढ़ते हर कदम से जुड़ गई जो।

टुटता हौसला, सुनी वो निगाह,दर्द है बेहिंतिया, वो गहराइयां, झुकती हर पलक से झलक गईं जो।।

ठोकर लगी, तो गिर गया बेगाना।

टूटा ऐसा, के बिखर गया बेगाना।।

ठोकर है ज़िन्दगी, बेदर्द ये समा, हर एक एहसास मेरे।

तन्हा है लम्हा, बिखरी ये ज़िन्दगी, हर एक एहसास मेरे।।

हर ठोकर ए ज़िन्दगी, एहसास हर ठोकर से एक हुआ।

गिरा उठा, फिर से जो गिर गया, तो एहसास एक हुआ।।

न जाने था वो क्या, हुआ जो एहसास एक।

एहसास है हुआ था जो एहसास वो एक।।

जल गई थी रस्सी ये ज़िन्दगी, शायद जो उम्मीद पूरी तरह।

बच गया था बल ये सांसे, शायद जो ज़िन्दगी उसमें बुरी तरह।।

एहसास है, दर्द ए बेबसी, आखरी वो निसान,
ज़ख्मी है लम्हा, वो बल आखरी जो टूट गया।

तम्मना है वो जीने की, ख़्वाब एक अधूरा सा ज़िन्दगी,
बेबस है वो एहसास, सरेराह एक दम जो छूट गया।।

ऐसा क्यों लगता है, पँछी अब मर जायेगा।

जीत जाएगा, हर जुल्म ओ सितम और पँछी पिंजरे में तड़प-तड़प कर अब मर जायेगा।।

खामोश है ज़िन्दगी, हर लम्हा जिसने जलाया।

हर सांस है चाहत मेरी, काटो पर जिसने चलाया।।

दौर-आखरी, ये सफ़र है तन्हा, बन्द पिजरा जिसमे टूट गया।

राह ए शूल लिपटे है शोले जिसमे अनन्त ज़िन्दगी,
छोर ए उम्मीद, आखरी है जो अब कहि वो छूट गया।।

जख्मी है पंख, हालात ए ज़िन्दगी, चले जो उठ कर, दम वो अब नही।

रात है काली, ये वख्त-वख्त की बात, सुहाना कोई ख़्वाब, बाकी अब नही।।

सफ़र ए जिंदगानी, यहाँ हर लम्हा है जो खामोश।

जनून ए जिंदगानी, यहाँ हर अरमान है जो खामोश।।

उम्मीद आखरी, गुम-नाम वो मंजिल।
सुनी ये राह, उखड़ती सांसे, कर पाएंगी क्या,
मंजिल अब हासिल।।

एक एहसास बंजर ये माहौल, सूखता ये कण्ठ।
एक चाह आखरी ये ज़िन्दगी, टुटता ये दम।।

एक खेल…ज़िन्दगी^३^

एक एहसास बंजर ये माहौल, खुखता ये कण्ठ।

एक चाह आखरी ये ज़िन्दगी, टुटता ये दम।।

सफ़र है तन्हा, ये समा वीरान, उड़ रहा तन्हा वो पंछी, जख्मी है उसके जो अरमान।

नाज़ुक है पंख, ये उखड़ती सांसे, छूटते लम्हे जो ज़िन्दगी से उसके, है वो लहूलुहान।।

आग उगलती ये फ़िज़ाय, न कोई दरख़्त, न कोई ओट, दम अब उसका टूटने लगा है।

प्यासा ये कण्ठ, एक बोल ज़िन्दगी, ये बेदर्द हवाएं, मोह ज़िन्दगी से अब मुड़ने लगा है।।

होता है नादां-परिंदे, एहसास जो एक।

बदलेगा मौसम, थामे हुए, वो आस जो एक।।

बरसेगी कभी तो कोई बून्द, प्यासे कण्ठ से जो उतरेगी।

रुकी सांसे, ठहरी ये ज़िन्दगी कभी तो एहसास जो सम्भलेगी।।

ए वख्त बिछाए है जो जाल, बेदर्दी हर जगह-जगह।

हर लम्हा है लहूलुहान जिनसे मेरा, सितम हर जगह-जगह।।

घायल अरमान, जख्म ए हालात, अब और है गहरे।

तड़पती धड़कने, उखड़ती सांसे, हर ओर है पहरे।।

ये पँछी है ज़िन्दगी, जिसे उड़ना ही है।

हर ठोकर है अहसास, जिसे सम्भलना ही है।।

ये खेल जिंदगी बेदर्द एक एहसास नही है खेल कोई।

हर एहसास एक तरंग जिंदगी सांसो से है मेरे टकराई।।

देखना है ज़ोर-ज़िन्दगी, बाकी है कितना, बेबस परों में अब तेरे।

दम तो पहले ही घुट चुका है, धड़कने ही बाकी है सीने में बस अब तेरे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

नमस्कार मित्रों, आप सभी प्रिय प्रियजनों के साथ अपनी एक अति संवेदनशील रचना ^एक खेल जिंदगी^ का, अपने यूट्यूब चैनल Kavi Vikrant Rajliwal पर आज के अपने Live वीडियो के प्रसारण कार्यक्रम का लिंक साँझा कर रहा हु।

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