Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतंत्र लेखक-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।-स्वतंत्र लेखक-

Feb 24, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

2 comments

गुजरता लम्हा।

हर लव्ज़ जो रूह से होते है बयां, हर दर्द एक हक़ीक़त को करते है बयां।

हर एहसास, एक तड़प के जो अधूरे से है निसान, हर अश्क़ जिनके होते है निगेहबान।।

हर ख्वाब, एक हक़ीक़त को देखती है आँखे, जागते है ख्वाब मेरे, जगती है आंखे।

हर रात एक सूरज निकलता है ओट से चांद के, हर रात एक सूरज डूब जाता है लिपट कर चाँद से।।

हर धड़कन हर लम्हा धड़कती है दिल मे कहि जो मेरे। हर एहसास दब जाते है रुकी हर धड़कनों से जो मेरे।।

हर शख़्स, हर रिश्ता जो अज़नबी सा है आज भी। रिश्ते अजनबियों से निभाए जाते है हम आज भी।।

हर दर्द, हर सितम एक दास्तान है ख़ामोश एहसास की आज भी।
हर एहसास से हर दर्द, हर सितम छुपाए जाते है हम आज भी।।

हर हक़ीक़त, एक लव्ज़, हर एक एहसास मेरे, हक़ीक़त है हर लव्ज़, हर एक एहसास मेरे।

हर अश्क़, हर निशां, हर एक तड़प मेरी, सितम है धड़कती ये जो जिंदगी मेरी।।

हर लम्हा, आज भी ख़ामोश सा है ज़िंदगी मे जो कहि,
हर लम्हा बतलाता है हर लम्हे से ख़ामोश हर लम्हे की एक दास्तां मेरी,
ख़ामोश हर लम्हे की एक दास्तां मेरी, ख़ामोश हर लम्हे की एक दास्तां मेरी…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

24/02/2019 at 08:35 am
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2 thoughts on “गुजरता लम्हा।

  1. बहुत ही सुंदर —–राही

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