Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतंत्र लेखक-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।-स्वतंत्र लेखक-

Feb 27, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

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👤 एक राही ज़िंदगी का…विक्रांत राजलीवाल (एक एहसास सत्य अनुभव से प्रेरित है)

सत्य अनुभव से प्रेरित कुछ एहसास।FB_IMG_1549024874629

कोई मासूम-बेगुनाह इंसान,एक राही के तौर पर जब किसी अंजान रास्ते के कठिन मार्ग पर अपनी हिम्मत और लगन से अकेले ही अपनी मंज़िल तक पहुचने की ठान लेता हैं। और वह मंज़िल के अत्यंत समीप पहुच भी जाता हैं मग़र!

सफर के शुरुआत से लेकर अंत तक जब तक वह अपनी मंज़िल हासिल नही कर लेता, उसे क्यों एक अनजाने डर का साया हमेशा ही सताता रहता हैं हर पल प्रत्येक क्षण?

क्या वह उस अंजान रास्ते का गुम-नाम राही यह सोच कर तो नही डर जाता हैं कि कहि वो उस कठिन मार्ग पर चलते हुए लापता ही न हो जाये या फिर वह यह सोच के परेशान हैं कि उस अंजान मार्ग पर चलते हुए उसकी शख्सियत या उसका व्यक्त्वि ही न मिट जाए?

आज कुछ अपने उसे अपने साथ दिख जाते हैं पर जो मार्ग सच्चाई का उसने सब के विरोध के बाबजूद चुना हैं, उस मार्ग पर चलते हुए प्रत्येक क्षण जलते हुए, जो कहि वो असफल हो जाए तो क्या वो ही अपने, उसे चेन से ज़ीने देंगे या उस सचाई के मार्ग को ही झुठला कर उसे एक विकृत मानसिकता का ही कोई प्रतीक घोषित कर देंगे?

बचपन से ही सत्य से प्रेरित उस अंजान मार्ग के गुमनाम राही को उस कठिन मार्ग पर चलने की शक्ति उसे उन अपनों ने ही तो दी थी?

फिर क्यों आज उस राही को वह तमाम लोग अपने उस सचाई के मार्ग पर पड़ने वाले हर एक जटिल मोड़ पर अपने विपरीत कहि छूटते हुए दूर खड़े नज़र आते हैं?

👉 यह भी सत्य हैं कि हर युग में हमेशा से ही सचाई के हर एक मार्ग पर जो प्रारम्भ में एक अंजान मार्ग के समान ही अत्यंत जटिल प्रतीत होता है उस सत्य के दिव्य मार्ग पर जो भी राही चला हैं उसका सामना ऐसे ही अत्यंत कटीले काँटेदार एहसासो से ही हुआ हैं। फिर चाहे वह कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन हो या वनवास की पीड़ा भोगते प्रभु श्री राम।

👉 सत्य यही है इस बेदर्द संसार का कि…

सत्य के कठिन मार्ग पर कितने ही अंजान रास्तों से चाहे क्यों न गुज़रना पड़े।

कुछ अपनों से सत्य के मार्ग पर चाहे क्यों न बिछुड़ना पड़े।

पर रहेगा जो राही अड़िग राह सत्य पर अपने,देखना मंज़िल जीवन की पा जायेगा सत्य से एक दिन वो अपने।

बदल देता हैं वख्त, दस्तूर ए ज़माना वो राही
टूटते हुए जुड़ते हुए जो चलता जाता हैं राह सत्य पर निरंतर अपने।।

हो जाता हैं फ़ना ज़िस्म उसका, तड़प जाती हैं रूह भी बेहिंतिया उसकी,

रहता हैं फिर भी कायम हौसला, चलता हैं वो के उसे चलते ही जाना हैं।

👉 वो अपने, वो कुछ पराये दीखते हैं खुद से दूर छुटते उसको कभी।

हर एहसास बेमाने से सिद्ध हो जाते है उसके सरेराह एकदम से कभी।।

चल रहा है दम तोड़ती हर उम्मीद से, आज भी वो राही, राह सत्य के मार्ग पर, प्रत्येक क्षण खुद ही खुद से जलते हुए।

हर अंधकार में कोई एक उज्जला खुद से तलाशते हुए, प्रत्येक क्षण खुद ही खुद से मरते हुए।।

सत्य यही जाना है उसने बेदर्द इस ज़माने का,जलना पड़ता है जलना पड़ेगा, जला के ही खुद को, तपा के खुद को बन पाता हैं कुंदन सोना…

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

27/02/2019 at 19:30 pm
(पुनः प्रकाशित कुछ तँकन सुधारूपरांत विक्रांत राजलीवाल द्वारा)

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