Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतंत्र लेखक-

काव्य-नज़्म, ग़ज़ल-गीत, व्यंग्य-किस्से, नाटक-कहानी-विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।-स्वतंत्र लेखक-

Mar 16, 2019
Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal -स्वतंत्र लेखक-

no comments

🌹अश्क़।

महोबत से कायल है महबूब की वो अपने, लम्हा लम्हा मर्ज़ ए महोबत से घायल है महबूब की वो अपने।

देखता है सूरत ए यार बेहद नज़दीक से वो अपने, करता है प्यार महबूब को बेहद नज़दीक से वो अपने।।

हुस्न के वार से इश्क़ तड़प जाता है बेहिंतिया, उठ उठ कर सर्द रातो में जख्मों को कुरेद देता है वो अपने बेहिंतिया।

उसकी मदहोश आँखें उसके दर्दो को बयाँ करती है हर दर्द से उसके उसका दीवाना तड़प जाता है आज भी बेहिंतिया।।

चिर के दिल ख़ंजर से ज़हरीले अपना, फैला दिया ज़हर रग रग में नाम ए महोबत बेवफाई का उसके जो आज भी बहुत ज़हरीला।

पहुचाता है सकूँ जख्मों को मेरे, हर एक ज़ख्म नया, कर देता है जिंदा ज़हर झूठी महोबत का उसकी जो आज भी बहुत ज़हरीला।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

16/03/2019 at 6:15 pm

FB_IMG_1548675533091FB_IMG_1530845871878FB_IMG_1514814740312

Leave a Reply

Required fields are marked *.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: