क़िताब ए महोबत के पाक पन्नों पर दर्द, एक दीवाने का लहू जो अब बरस गया। जख़्मी दिल के ज़ख्मो से तमाम, तेज़ाब कोई जो सरेराह अब बरस गया।। याद आई बिछुड़े महबूब की जब जब अपने, बेदर्द यह ख़ूनी सावन भी तब तब गरजा बेहिंतिया और टूट कर बरस गया। देख कर तड़प एक […]

via 💌 एक इंतज़ार… महोबत। (दास्ताँ श्रुंखला के अंतर्गत प्रथम दास्ताँ) — Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation’s -स्वतंत्र लेखक-

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    💌 एक इंतज़ार… महोबत।

    (दास्ताँ श्रुंखला के अंतर्गत प्रथम दास्ताँ)

    नमस्कार मित्रों, मेरी नज़्म श्रुंखला के अंतर्गत मेरी प्रथम दास्ताँ एक इंतज़ार…महोबत। को आपकी अपनी ब्लॉग साइट परआप सभी प्रियजनों के पाठन के लिए प्रकाशित कर दिया गया है।

    मित्रो अगर आपको मेरे द्वारा लिखित मेरी यह नज़्म शायरी के रूप में मेरी दर्दभरी महोबत कि दास्ताँ पसंद आए तो कृपया मेरी इस दास्ताँ को अन्य प्रेमी पाठको से भी अवश्य सांझा करे। एव मेरी आगामी दर्दभरी महोबत की नज़्म दास्ताँ को पढ़ने के लिए आज मेरी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com को फॉलो कर के मुझ से मेरी आगामी रचनाओ से जुड़ जाइए।

    (प्रकाशित समय 9/04/2019 at 10:40 am)

    धन्यवाद।

    आपका मित्र विक्रांत राजलीवाल।

    मेरी प्रकाशित एव आगामी रचनाओ (दर्द भरी नज़्म दास्ताने) के पाठन के लिए कृप्या आज आपकी अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com द्वारा जुड़ जाइए।

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