Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal Creation's -स्वतन्त्र लेखन-

Poetry, Kavya, Shayari, Sings, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

April 28, 2019
Kavi, Shayar & Natakakar Vikrant Rajliwal Creation's

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💏 पनघट।

पनघट किनारे देखन मोह को चोरी चोरी शाम पधारे,
ओ री मोरी सखी, ओ री मोरी सहेली।

अंखियन में उनके प्रेम अठीहेली, प्रेम करन को उनको जी मोरा ललचाए,
ओ री मोरी सखी, ओ री मोरी सहेली।।

बांध कमर से आयो बांसुरी वो अपने सुरिली, छेड़ दियो पनघट से राग कोई फिर मनोहरी,
ओ री मोरी सखी, ओ री मोरी सहेली।

बतीयन से अपने मीठी मीठी, जादू कोई फूक दियो काला, स्पर्श ह्रदय का कर मोरे, वश लीयो मोहे गिरधर बलिहारी,
ओ री मोरी सखी, ओ री मोरी सहेली।।

बाके संग रास रचाकर, गईं मत मोरी मारी, खो गई सुध बुध प्रेम वशीकरण से छलिया के जो मैं हारी,
ओ री मोरी सखी, ओ री मोरी सहेली।

शाम ढले ही छेड़ दियो ओ नीर यमुना के किनारे मोहे, ओ नटखट ओ गिरधर बिहारी,
ओ री मोरी सखी, ओ री मोरी सहेली।।

पकड़ मोहे ओ जकड़ा एसो, देकर बल वो कलईया मोरी मरोड़ी, हो लज्जा से गई मैं फिर पानी पानी,
ओ री मोरी सखी, ओ री मोरी सहेली।

नयन कंटीली रसिया के, काया कंचन सी प्यारी प्यारी, भाग्यो मन के मोए ओ बलमा मोरा ओ किरशन गिरधारी,
ओ री मोरी सखी ओ री मोरी सहेली।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

28/04/2019 at06:05 pmLogopit_1556454762522

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