Author, Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari, Gazal, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

May 10, 2019
Author, Writer, Poet And Dramatist Vikrant Rajliwal

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🕯️ ख़ामोशीया

रुकती सांसो से रुक सी जाए जब धड़कने, हर धड़कन पर पहरा कोई, शिकंजा शिकारी सा कसने जब लगे।

ख़ामोश हर लव्ज़ बंद जुबां से बोलने जब लगे,दबे एहसास भी झिलमिलाती नज़रो से झलकने जब लगे।।

हर आरज़ू एक फ़रियाद ख़ुद ही बनने जब लगे, हर फ़रियाद से जान जिंदगी की निकलने जब लगे।

हसीं हर ख़्वाब भी टूटने एकदम से जब लगे, सामना हक़ीक़त से हक़ीक़त का होने जब लगे।।

लहू जिस्म से धड़कनो तक पहुचते हुए रुकने जब लगे, हर धड़कन भी धक से धड़कना भूलने जब लगे।

होश नागवार से महसूस सरेराह बेहोशी सी छाने जब लगे, हर साया साये से अपने दूर कहि जाने जब लगे।।

दम तोड़ती ज़िन्दगी दबी जुबान से जिंदगी को बुलाने जब लगे, निसान चाहतो के खुद चाहते मिटाने जब लगे।

हर कदम एक इम्तेहां और हर नज़र ज़हर बरसाने जब लगे, एहसास खुद एहसासों से अपने एहसास चुराने जब लगे।।

ज़हर जिंदगी का जिंदगी से जिंदगी में उतारने हम जब लगे, टूटी सांसो को टूटी धड़कनो से छुपाने हम जब लगे।

बोलते एहसासों को ख़ामोश एहसासों से दबाने हम जब लगे,
बेपरवाह जिंदगी को लगा कर गले, जिंदगी खामोशी से हम जीने जब लगे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
10/05/2019 at 5:57 pm

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