Author, Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari, Gazal, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

May 24, 2019
Author, Writer, Poet And Dramatist Vikrant Rajliwal

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अधुरे एहसास। (नई ग़ज़ल)

ज़िन्दगी में चेहरे धुंधलाते से पड़ गए जितने, देखा है हमने ज़िन्दगी में अक्सर हमे वही चेहरे याद रहे।

रहे ना रहे हम ज़िन्दगी में ए ज़िन्दगी फ़क़त रह जाएंगे निसान ज़िन्दगी में ज़िन्दगी के जो हमने कभी मिटने नही दिए।।

एहसास हैं मुझे हर लम्हा उन एहसासों का अपने, धूल जिन पर बदलते वक़्त से भी कभी चढ़ने ना दी हमनें।

छूट गए फिर भी एहसास कई, टूटते हर एहसासों से जिन्हें चाह कर भी कभी सम्भाल ना पाए हम।।

आह एक दर्द आज भी है कायम जो ज़िन्दगी, एहसास ये ख़ामोशीया, आज भी रुला जाती है मुझे जो।

याद है दिन आज भी बचपन के वो मासूम मेरे, हर लम्हा एक एहसास नया होता था कोई जब मुझे जो।।

ज़िन्दगी अब रुक सी गई है मेरी, हर एहसास भी ठहर से गए है मेरे जो।

हर साया अपना सा नज़र आता है पराया, हर एहसास भी अपने से मरते गए है मेरे जो।।

एक सवाल आज भी अधूरा सा है मेरा, हर एहसास भी टूट से गए है मेरे जो।

सकूँ सांसो का गुम है ज़िन्दगी से मेरे कहा, हर एहसास भी कहा सलामत बच सके है मेरे जो।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

24/05/2019 at 08:30pm FB_IMG_1530111247697

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