रेप! कहने को तो एक शब्द होता है। परन्तु इस शब्द रेप की वास्तविकता अत्यन्त ही भयानक होती है। रेप और रेपिस्ट? क्या रेप करने वाला ही रेपिस्ट होता है या जिन्होंने वह अनैतिक हालात उतपन किए क्या कहि ना कहि वास्तविक दोषी वही तो नही होते? यदि उन व्यक्तियों ने, जिन्होंने एक मासूम को उन हालातों के सुपुर्द्ध कर दिया, जिन हालातो में फंस कर एक मासूम ने अनेकानेक प्रकार के शोषणों का सामना करते हुए किसी प्रकार से स्वम् को टूट कर बिखर जाने से संभाल कर रखा हुआ था।

ऐसे ही अत्यंत दर्दभरे हालातो से कभी मुझको भी गुजरना पड़ा था जिसका खुलासा मैं अपने ब्लॉग एक सत्य। के आगामी ब्लॉग्स में एक उचित प्रकार से अपने लेखन के माध्यम द्वारा आप सभी प्रियजनो के साथ अवश्य करूँगा कि सत्य के साथ आपको किस प्रकार से अनेक प्रकार की जटिल परिस्थितियों में अत्यधिक भयानक वातावरण में आपको अपने जीवन आदर्शो के लिए एक युद्ध लड़ना पड़ सकता है। एक युवक होने के वावजूद उन हालातो की उस असहनीय पीड़ा से उभरते हुए स्वम् को एक सकारात्मक दिशा प्रदान करना मेरे लिए कभी भी सरल नही रह है।

शिघ्र अति शीघ्र ही मैं अपने आगामी ब्लॉग एक सत्य (2) को आप सभी के लिए प्रकाशित करूँगा। और इसके साथ ही अपनी अत्यधिक दर्दभरी विस्तृत नज़्म दास्ताँ शृंखला के अंतर्गत अपनी दूसरी अत्यधिक दर्दभरी विस्तृत नज़्म एक दीवाना को भी आप सभी प्रियजनो के लिए प्रकाशित करूँगा।

तब तक आने मित्र विक्रांत राजलीवाल को आज्ञा दीजिए।

अंत: मे जाते जाते इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि…

आज होता है एहसास की जिंदा रखने के लिए खुद ही खुद को हमने मार डाला था।

आहट से बर्बादियों की हमने अपनी, खुद ही खुद को जिंदा दफना डाला था।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
10/06/2019 at 7:40pm

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