Author, Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari, Gazal, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

June 21, 2019
Author, Writer, Poet And Dramatist Vikrant Rajliwal

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एक सत्य। (2)

अक्सर मुझ से जब भी कोई पूछता है कि आपके जीवन में आप कि अब तक की सबसे अहम उपलब्धि कौन सी है? तो मैं उन से सिर्फ इतना ही कहता हूं कि आज भी मैं जिंदा हु और मेरा दिल एक स्वास्थ्य रूप से निष्पाप भाव से धड़क रहा है ना जो, यही है मेरे जीवन की अब तक कि सबसे अहम उपलब्धि।

आप सोच रहे होंगे यह कैसे? तो मैं आपको बता दु कि यह आपके लिए सहज हो सकता है परन्तु मेरे लिए यह कभी भी इतना सहज नही रहा। एक अबोध बालक (17 वर्षीय) जब सुधार के मार्ग को स्वम् अपनी इच्छा से चुनता है एव उस मार्ग पर अनेक प्रकार की जटिल परिस्थितियों से जब उसका सामना होता है तो सच कहता हु मित्रों एक बार को धड़कता दिल भी अपनी धड़कनो को भूल जाता है। सुधार के मार्ग पर मानव जीवन के सद्व्यवहार एव दुर्व्यवहार के बीच के अति महिम अंतर को समझते हुए स्वम् के व्यवहारों से हर प्रकार के दुर्व्यवहारों को अपने नेक विचारो एव दृढ़ जीवन संघर्ष के द्वारा सद्व्यवहार में परिवर्तित करने का एक प्रयास करना।

यद्यपि आपको ज्ञात है कि वर्तमान में हर चिर परिचित व्यक्ति चाहे वह आपके परिवार के सदस्य हु या जिन गुरुजनों से अपने सुधार के मार्ग को जाना या समझा है आपको आपके भूतकालीन व्यवहारों से जांचते हुए आपके वर्तमान कालीन सुधारात्मक कार्य को नकारते हुए आपके व्यक्तित्व को एक शंका कि दृष्टि से सहज ही देखेंगे। ऐसे जटिल परिस्थितियों का सामना करते हुए सुधार के मार्ग पर संघर्षमय रहते हुए नितप्रति दिन कदम दर कदम स्वम् को संभालते हुए जीवन के सहज मार्गो पर भी जटिलता का सामना करते हुए जीवन के प्रति प्रगतिशील बने रहना सच मे मित्रों इतना सहज कभी भी नही रहा।

याद है… वह सुबह भी उतनी ही परिचित और ऊर्जावान थी जितनी कि अन्य किसी दिन की सुबह होती थी। उस दिवस भी सुबह उठते ही सर्वप्रथम जो एक एहसास हुआ था वही एहसास अन्य किसी भी दिन की सबुह से कदापि कुछ अगल नही था। सुबह आंख खुलते ही सर्वप्रथम जो एक एहसास हुआ वह था कि हा आज भी में बीते कुछ दिनों के समान स्वम् के अनुशाशन के विपरीत अखाड़े या स्टेडियम में जाने के लिए सुबह के 3:10 बजे ना उठते हुए सुबह के 7:00 बजे उठा हु। और अब मैं पहले के समान स्वाथ्य एव उतनी शक्ति महसूस नही कर पा रहा हु अपितु अब मैं किसी पुराने खंडर के समान कुछ कुछ जर्जर सा होता जा रहा हु। आज भी सुबह उठते ही मैं आत्ममंथन कर रहा था कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा और मैं पुनः सुबह 3:10 बजे उठ कर पुनः अपने जीवन मे एक अनुशाशन स्थापित करते हुए अखाड़े जाना आरम्भ कर दूँगा। हा आज का यह विचार कई मायनों में कुछ अगल था क्योंकि अभी कुछ दिन पूर्व ही मेरी मुलाकात अक्समात ही अपने गुरुजी (कोच) जी से हुई थी और उन्होंने मुझको पुनः अखाड़े में आने के लिए प्रेरित भी किया था। इस किस्से की दास्तां भी सही समय पर आपसे अवश्य बताऊंगा कि जो मेरे जीवन का पहला सकरात्मक सत्य एव सकरात्मक परिवर्तन था, है और हमेशा ही रहेगा।

खैर जो भी हो प्रकृति को शायद आज कुछ और ही मंजूर था। उपरोक्त एहसासों का मंथन करते हुए मैने अपने बिस्तर को त्याग कर अपने दैनिक दिनचर्या की शुरुआत करि। सर्वप्रथम उस दिन मैने अपनी जेब की तलाशी करि कि कुछ रुपए ही मिल जाए। परन्तु फिर अक्समात ही ध्यान आया कि बीते कुछ महीनों से मैने एक रुपया भी तो अपने परिजनों से नही लिया। फिर आज क्यों मुझमें इतनी बैचेनी उतपन हो गई थी। इस बात का स्वम् मुझ को भी कोई एहसास नही था। तुरन्त ही मैंने अपने पिताजी की जेब से कुछ सो रुपए यानी कि 100 रुपए निकाल लिए। जी हां अपने सही ही समझा मैने अपने पिताजी की अनुमति के बिना ही उनकी जेब से सो रुपए यानी कि 100 रुपए निकल कर अपनी जेब मे रख लिए और उनके एव अपनी माताजी जी जो कि दिल्ली पुलिस में दरोगा है के दफ्तर जाने कि प्रतीक्षा करने लगा। और कुछ समय के उपरांत वह अपने अपने दफ्तर के किए रवाना भी हो गए। तदुपरांत मैने भी स्नानादि कर के अपने जूते के फीते कस लिए और बिना कुछ सोचे समझे अपने सरकारी पुलिसया क्वाटर से बाहर की ओर प्रस्थान कर लिया।

आज मुझे शायद कुछ अधिक ही बैचेनी महसूस हो रही थी और बारम्बार ही कुछ दिन पूर्व की अपने अखाड़े के गुरु सी हुई वार्तालाप का सहज ही स्मरण हुए जा रहा था। और उसी बेसुधी में मैं निरन्तर तेज़ कदमो से चले जा रहा था। जैसे कि उस मार्ग को मैं अपने सरकारी पुलिसया क्वाटर से ही तय कर के निकला हुआ हूं। और कुछ ही पलों के उपरांत में नजदीक के बस स्टॉप पर पहुच गया। फिर…

शेष अगले ब्लॉग में।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखीत।
21/06/2019 at 8:40 pm20181015_120830

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