Author, Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal

Poetry, Shayari, Gazal, Satire, drama & Articles Written by Vikrant Rajliwal

July 14, 2019
Author, Writer, Poet And Dramatist Vikrant Rajliwal

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एक सत्य। (3)

जारी है…

फिर कुछ ही क्षणों के उपरांत मैं नज़दीक के बस स्टॉप पर पहुच जाता हूं। वहा बस स्टैंड के ठीक बाई ओर कुछ गज़ की दूरी पर वह पवित्र अखाड़ा था जहाँ मैं कुछ समय पूर्व तक प्रातः काल 3:35 मिनट पर एक टूटे जाल से होते हुए स्टेडियम में दाखिल हो जाता था। और आज इस समय इस प्रकार से इन अत्यन्त ही अजीबो गरीब हालातों में अपने पूज्य पिताजी के पतलून से 100₹ निकाल कर मंडी जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहा था। यह सब महसूस करते हुए मेरी सांसो में कुछ अजीब सी एक घुटन महसूस हो रही थी। उसी समय एक निजी बस ठीक मेरे सामने तेज़ी से हार्न बजाते हुए बस स्टॉप पर आ कर रुक गई। और मैंने बस का नम्बर देखा जो अब तो मुझ को ठीक प्रकार से ज्ञात नही परन्तु उस समय उस बस के नम्बर को देखते ही मैं जान गया था कि हा यह बस मंडी से होते हुए ही मंडी के समीप से ही गुजरेगी। बस फिर क्या था मैं तुरन्त ही बिना एक क्षण भी गवाए सीधा बस के पिछले दरवाजे से होते हुए उस बस पर सवार हो गया। और उस बस के पिछले दरवाजे से अगले दरवाजे के समीप पहुचते हुए उस बस के अगले दरवाजे के समीप एक ओर को खड़ा हो जाता हू।

अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि तभी उस बस के कंडक्टर ने एक ओर से एक जोरदार आवाज लगा दी कि “टिकट” उस कड़क आवाज को सुनते ही मुझे कुछ वास्तविकता का अभ्यास हुआ और मैं आहिस्ता से चलते हुए उस बस के कंडक्टर के समीप पहुचा और उससे मंडी की टिकट काटने को कहा। कुछ ही देर में वह बस मंडी के समीप पहुचने ही वाली थी और मैने उस बस के कंडक्टर से अपने बकाया रुपए वसूल करें और अपने कमीज की जेब मे रख लिए। तभी वह बस एक जोरदार हार्न बजाते हुए मंडी के मुख्य द्वार के समीप बने बस स्टॉप पर एक झटके के साथ रुक गई। मैं उस बस के रुकने से पूर्व ही चलती बस से मंडी के मुख्य द्वार के सामने उस बस से निचे को कूद गया। बस से नीचे कूदते ही हर बार की तरह ( जितनी बार भी मैं मंडी को आया था ) मेरा ह्रदय एक बार को जोर से धड़क गया और मैने मंडी के ठीक विपरीत दिशा में एक नज़र दौड़ाई जहाँ हमारे कुछ रक्त सम्बंधिक्त नज़दीकी रिश्तेदार रहते है। फिर बिना एक क्षण भी गवाए मैं सीधा मंडी के मुख्य द्वार से होता हुआ मंडी के भीतर प्रवेश कर जाता हूं।

उस समय मुझ को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो वहां (मंडी) हर एक व्यक्ति को यह अच्छे से ज्ञात है कि मैं यहाँ क्यों आया हु और कहा जा रहा हु अभी मैं अपने इन एहसासों से झूझ ही रहा था कि तभी मेरे पीछे से एक ट्रक की जोरदार हार्न की एक तीव्र ध्वनि सुनाई देती है। उस तीव्र ध्वनि को सुनते ही मुझ को एक बार पुनः यह एहसास हो गया कि मैं कहा खड़ा हूँ और कहा जा रहा हु। अपने मस्तिक्ष में ऐसे ही कई प्रकार के सवालों से जूझते हुए मैं उस सब्जी मंडी (एशिया की सबसे बड़ी सब्जी मंडी) से गुजरते हुए मंडी के दूसरी ओर पहुच जाता हूं जहाँ समीप की झोपड़पट्टी के समीप की एक दीवार को कुछ मनचलों ने तोड़ दिया था। उस टूटी दीवार से होते हुए में उस मंडी को पार कर जाता हूं और दूसरी ओर रेलवे के फाटक के समीप एक खुली सड़क पर आ कर खड़ा हो जाता हूं। आज मुझ को यहाँ सब कुछ अत्यंत ही अलग प्रकार का महसूस हो रहा था। कि तभी कुछ दूरी पर कुछ नौजवान और अधेड़ उम्र के चिलमची और उनके समीप ही गिलासियो पर सट्टा लगते हुए कुछ अन्य चिलमचियो का एक समूह मुझ को दिखाई दिया। तभी ना जाने क्यों मैं बिना एक क्षण भी गवाए उनके समीप पहुच कर खड़ा हो जाता हूं कि तभी…

शेष अगले ब्लॉग से।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
14/07/2019 at 2:00pmPhoto_1563090092036.png

*I will soon publish this blog in English language and publish it.*

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