एक चीख सुनाई देती है आज भी अनजाने मुसाफ़िर मुझे। ये रुकी सांसे ये ठहरी ज़िन्दगी ये एहसास ए जुदाई, मेरे खुद के नही।। खो गए है जो एहसास न वो मेरे थे और कॉयम है जो एहसास अभी टूटी धड़कनो में मेरे न ही ये मेरे है। हम मिले के नही एक दूजे से […]

via एक अधुरा फ़साना। — Author, Writer, Poet & Dramatist Vikrant Rajliwal

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