Advertisements

🌹 एक दीवाना। (दास्ताँ के तहत दूसरी दर्द भरी दास्ताँ)

एक दीवाना मेरे द्वारा लिखी गई मेरे उन अनकहे एहसासों को बयां करती है जो कभी भी एक मुक्कमल अंजाम तक ना पहुच सकें। और जिन्हें चाह कर भी मैं कभी किसी के साथ बयां ना कर सका।
उम्मीद करता हु शायद आप तक मेरे वह एहसास पहुच सके। और आपको मेरी नज़म श्रृंखला के तहत यह दूसरी दर्द भरी दास्ताँ “एक दीवाना” पसन्द आए।

🌹”एक दीवाना।”

लिख देगा कलम ए मोहब्बत से नाम ए सनम दीवाना।

हो गई ख़त्म जो श्याही कलम में उसकी तो लहू अपना भर देगा फिर उसमें दीवाना।।

ले आया चुरा कर वक़्त ए ज़माने से अफ़साना ए मोहब्बत फिर जो।

हो गया गुनाह ए मोहब्बत नज़र ए महबूब में बता दिया सरेराह अफ़साना फिर मोहब्बत का जो।।

हुस्न औऱ इश्क की बातों से अंजान हु।

प्यार और मोहब्बत की सौगातों से अंजान हु।।

शिकवा ना गिला है इस बात का किसी हुस्न वाले से, दिलफेंक आशिक़ाना मिज़ाज से अपने परेशान हु।

हो कर फ़िदा हर क़ातिल अदा पर हुस्न के, नादां दिल के अपने मिज़ाज ए आशिक़ी से परेशान हु।।

मोहब्बत से सनम की हम जो दीवाना हो गए।

नादां उम्र में ही संगीन कई अफ़साने हो गए।।

हो गया ज़ख़्मी दिल टूट कर जो दीवाने का, दर्द ए दिल से हम फिर परवाना हो गए।

देखे जो शोले मदहोश नज़रों में नफ़रत के उनकी, जला कर ज़ख़्मी दिल शोले पर उनके, हम फिर दिलजले हो गए।।

हुस्न और इश्क़ की अजीब सी तासीर लगती है।

हर आशिक़ के लिए खुशनुमा कोई एक सौगात लगती है।।

होते है ख़ुशनसीब वो आशिक, वो दीवाने, नसीब में जिनके बेशकीमती ये सौगात होती है।

हक़ीक़त ए मोहब्बत बिन सनम ये जिंदगानी, खाती है ठोकरे और घनघोर काली रात नसीब में फिर दीवानों के होती है।।

किसी हुस्न वाले को ए दोस्त इल्जाम कोई देना ठीक नही।

मरते हुए आशिक़ और डूबते हुए दीवाने को बचाना रीत ये उनकी नही।।

क्या है इसमें ये उनका दोष।

वो तो है हमेशा से ही जो मदहोश।।

मरना है जिसे वो मरेगा ही।

डूबना है जिसे वो डूबेगा ही।।

बचा पाया है कौन उसे भला बेदर्द जो इस ज़माने में।

नही होती है प्रीत किसी से हुस्न वालो को बेदर्द जो इस जमाने मे।।

अफ़साना ए दीवाना…

हुस्न की बहार में उनकी डूब के मर जाने को जी चाहता है।

हुआ जो सनम से प्यार तो अब लूट जाने को जी चाहता है।।

भट्टी है दहकती हुई जो ये अंगार ए हुस्न ए शबाब से, दीवाने का जलते जले जाने का उसमे जी चाहता है।

महबूब की याद में अपने घुट घुट कर जीना, तड़पते हुए मरते मर जाने का फिर जी चाहता है।।

आता है बेदर्द जब भी ये ख़ूनी सावन, आग दीवाने पे बेहिंतिया वो बरसाता है।

तड़पता है दिल ये बेबस, सकूँ ए दीवाना फिर सरेराह जो लूट कर कहि खो जाता है।।

बेदर्द सावन की काली तन्हा रातों से, एक आग सी कोई जिस्म में भड़क जाती है।

जख़्मी दिल बन्द सीने में जिंदा जो दफ़न, एक फ़ांस सी कोई धड़कनो में उसके चुभ जाती है।।

आती है याद जब भी सनम की अपने, बन कर आँसू, लहू दीवाने का बह जाता है।

करते हुए एक सितमगर को अपने याद, रुका दिल जोरों से फिर धड़क जाता है।।

यादों में है सनम की वो खुशबू कोई ग़ुलाब की जो।

मल्लिका ए हुस्न है सनम वो कोई महताब की जो।।

किया है धड़कते दिल पर बेशक़ से वार उसने मेरे जो।

दिया है ज़ख्म तड़पती धड़कनो पर सरेराह बेशक़ से दर्द दिल का मेरे जो।

दीवाने के लिए उम्मीद का फिर भी चाँद वो कोई आफ़ताब लगती है।

हर लम्हा दर्द ए दिल दीवाने की मरहम जो उसकी एक दिलकश मुस्कान लगती है।

सितमगर कहूँ उसे अपना या मौत का अपनी कोई बेदर्द एक पैगाम।

लिख दिया लहू से दिल के दिल पर जिसने मेरे ये आखरी एक फ़रमान।।

कर के क़त्ल मदहोश निग़ाहों से, सब कुछ लूट लिया जो तूने मेरी जान।

बेबस है जख़्मी दिल जो मेरा, धड़कनो में उसके नही अब कोई जान।।

खाया है धोखा जो प्यार का, नही जीने का मुझ में अब कोई अरमान।।।

कहते है दुनिया मोहब्बत की जिसे, तन्हा ही दीवाना जो उसमे भटक रहा।

ढूंढता है सदियोँ से बिछुड़ा सनम, मासूम दिल जो बेहिंतिया उसका तड़प रहा।।

नादां दिल ए दीवाने ये क्या तुझ को हो गया।

हर अदा पर क़ातिल हुस्न के फ़िदा तू क्यों हो गया।।

दिखा था दीवाने जो कभी वीरानियों में महोबत का खिलता एक सुर्ख कमल।

चाहा जो झुक कर उसे उठाना, खिसख गई दलदली रुसवाईयों की सिखकती ज़मीन, हो गया साए से कहि दफ़न बदनामियों से मेरे वो मेरा खिलता प्यार का कमल।।

रहता है दीवाने को तन्हा चाँदनी रातों में इंतज़ार अब किसका।

हो जाती है दीवाने की दूर तन्हाई, दिखता है अक्स चांद में जब अपने महबूब का।।

याद है…

देखा था सनम को दीवाने ने जब पहली बार।

आया था मन मे दीवाने के तब नेक एक ख़्याल।।

हो नही सकती ये कोई मामूली इंसान।

जाग गए देख कर जिसे दिल के सब अरमान।।

दिल ने कहा दीवाने से दीवाने के ये तो कोई हूर दिखती है।

अपनी मदहोश जवानी के नशे में शायद ये चूर लगती है।।

दिल के हाथों ये दीवाना जो अपने मजबूर है।

फिर किसलिए सनम से वो अब अपने दूर है।।

देख कर बेबस नज़रो से अपनी उसे, सोचता है कुछ दीवाना जो अब।

मदहोश निगाहों ने उनकी उसे, देखा होगा क्या दीवाने को अपने अब।।

या यह भी कोई फिर धोखा निगाहों का होगा अब।

देखना ये दिल दीवाने का बहुत बेबस होगा अब।।

मदहोश निग़ाहों में सनम की एक अजीब से नशे को देखा था।

हो गया था मदहोश दीवाना भी, एक अनोखे नशे को जब देखा था।।

अजीब सी कशिश थी नज़रो में एक उसकी जो।

समुंद्र सी गहराई थी नज़रो में एक उसकी जो।।

दिखता है दरिया ए मोहब्बत बेशुमार, मदहोश नज़रों में उसकी जो।

चाहता है डूब जाए दिल ए दीवाना वो उसमे, दिखता है दरिया ए मोहब्बत नज़रो में जो उसकी जो।।

ऐसा लगा वो भी अब शायद वफ़ा दीवाने से करेंगे।

जल्द ही हम दोनों अब शायद एक दूजे पर मर मिटेंगे।।

सनम की उन तीखी नज़रो का जादू चल गया।

होश ओ हवास को दूर कहि जो दीवाने से ले गया।।

नज़दीक से दीवाने ने एक रोज जो दिलबर को देख लिया।

हो गया बेहोश दीवाना जलवा ए हुस्न जो नजदीक से उसने देख लिया।।

नही है एहसास ए दीवाना अब बाकी जो दीवाने का अपने जो अब।

आलम ए बेसुधी जो किए जा रहे है दीदार ए सनम का अपने जो अब।।

कड़कती है बिजली दूर कहि कोई जो जब।

आता है होश ए दीवाना फिर वही जो जब।।

होश में दीवाना है फिर आया जब।

खुद को सनम के बेहद नज़दीक है पाया जब।।

इस जुर्रत पर खुद अपनी हैरान था ये दीवाना।

इस हरक़त से खुद अपनी कुछ परेशान था ये दीवाना।।

खुद से होकर के फिर शर्मिंदा, हट जाता है दूर सनम से ये दीवाना।

हो गया दीवाने को ये क्या, हर लम्हा यादों में उसकी खुद को पता है अब ये दीवाना।।

तमन्ना एक ही बाकी है दीवाने की अब।

हो जाए फिर एक बार दीदार ए सनम दीवाने को अब।।

ना जाने दीदार ए सनम अब हो पाएगा कब।

ऐसा क्यों लगता है दीवाना सनम को अपने दुंद ना पाएगा अब।।

जल्द ही वो दिन भी तक़दीर से दीवाने की आ गया अब।

देख के उन्हें बेबस दिल में फिर से एहसास ए प्यार समा गया जब।

देखता है जितनी मर्तबा सनम को दीवाना ये सनम का।

धड़कता है उतनी मर्तबा दिल ए दीवाना जो दीवाना सनम का।।

हो जाता मजबूर हर बार बेक़ाबू धड़कनो से जो दिल ए दीवाना।

जख़्मी दिल के जख़्मी एहसासों से जताता है प्यार अपने सनम को ये दीवाना।।

बेबाक़ मोहब्बत का अपनी एहसास उसे दिलाना चाहता है ये दीवाना।

धड़कते हुए दिल को अपने इस तरह शायद कुछ सकूँ पहुचाना चाहता है ये दीवाना।।

ना जाने क्यों एक अनजाने ख़ौफ़ का साया सताता है दीवाने को हर पल।

हो गए जो खफ़ा मेरे सनम, डरता है इस एहसास से दिल ए दीवाना पल पल।।

बेबसी ये दीवाने को अपनी रुलाए जा रही थी।

ख़ूनी आँसू रोए और पिलाए जा रही थी।।

खून से भरे घुट दीवाना पिए जा रहा है क्यों?।

आँसुओ को एहसासों से अपने दबाए जा रहा है क्यों?।।

खून से भरे घुट घूट-घुट कर पी लिए।

आँसुओ को आँखों मे ख़ामोशी से दबा लिए।।

दीवाना अब अक्सर दीदार ए सनम किया करता है।

ख़यालो में अपने अब अक्सर उनसे मुलाक़ातें किया करता है।।

ना जाने ये क्या हो गया मुझ को, ऐसा लगता है कि शायद उनसे प्यार हो गया मुझ को।

हर लम्हा हर घड़ी रहता है वो मासूम चेहरा नज़रो में उनका, कसक ए दिल तड़पाता है बेहिंतिया वो मुझ को।।

अपने डर से एक अंजाने डर जाता है दीवाना।

बेबसी को जान कर अपनी, बेहिंतिया तड़प जाता है दीवाना।।

कर के एक हुस्न से बेहिंतिया मोहब्बत बहुत पछताता है अब दीवाना।

देख कर जलवा ए हुस्न अक्सर वो उनका, ना जाने क्यों मचल जाता है दीवाना।।

एक रोज़ ज़िन्दगी में फिर दीवाने के बहार आई।

सनम से इस ज़िन्दगी में एक और मुलाकात आई।।

चिर के जिस्म अपना दीवाने ने जिंदा हर नब्जों को जो अपनी खिंच लिया।

सेक के लपटों से तपिस मोहब्बत की फिर एक नया रूप जो उन्हें दिया।।

कर ली कलम दीवाने ने अब अपनी तैयार।

दिल जलों के दिल पर करने को फिर एक वार।।

रहना होशियार ए दीवानों ये दिल ये धड़कने तुम्हारी अब है हमारा शिकार।

धड़कते हर दिल को बेहिंतिया धड़का कर, धड़कती हर धड़कनो में तुम्हारे, दिखाना है धड़कते किसी दिल का अब भी जो एक इंतज़ार।।

भर के वफ़ा ए मोहब्बत फिर उसमें तुम्हारा खोया प्यार वो जगाना है।

दिखा देगा अक्स ए मोहब्बत यही ये दीवाना अपनी, ज़िन्दगी से उसे दर्द ए दिल जो मिटाना है।।

चिर के दीवाने ने जख़्मी दिल लहू अपना फिर जो सरेराह बहा दिया।

आ गया ज़लज़ला ज़िन्दगी में उसकी, मोहब्बत ने एक दिलकश हसीना की उसे पागल बना दिया।।

दिया नाम ए सनम से उसने फिर एक पैगाम।

थाम के एक हाथ मे लहू ए ज़िगर से भरा एक जाम।।

लिख रहा है नाम ए सनम लहू से दीवाना वो अपने, अब जो एक पैगाम।

उम्मीद है पा जाएगा उसे, जब पढ़ेगी लहू ए ज़िगर से वो उसका जो एक वो पैगाम।।

देखा जब उन्होंने लहू ए जिगर से मेरे, मेरा वो एक आखरी पैगाम,
हो गए खफ़ा इस कदर वो हमसे क्यों सनम जो हमारे।

कर दिए टुकड़े टुकड़े बेदर्दी से टूटे दिल के मेरे, था जो मेरी मोहब्बत का पैगाम,
समझा लहू ए ज़िगर को एक दाग बेहूदा जो उसने, चल दिए मुड़ कर फिर क्यों वो सनम हमारे।।

समझ कर जख़्मी दिल को खिलौना जो उसने मेरे।

तोड़ दिया सरेराह बेदर्दी से दिल को जो उसने मेरे।।

नज़दीक सनम के दीवाने ने एक रोज़ की जो आने की हिम्मत तो पाया।

बैठे थे दरख़्त ए ओट में एक मदहोशी से सनम हमारे, और लिपटा था दामन से उनके एक साया काला।।

देख सनम को इस तरह दिल ये दीवाने का कुछ परेशान हुआ।

जान कर हक़ीक़त ए सनम जो हाल ए दिल उनका, ये दिल ए दीवाना हैरान हुआ।।

ज़िन्दगी ये दीवाने की एक दम से तन्हा जो हो गई।

ऐसा लगा उस साए से सनम की कोई करीबी जान पहचान हो गई।।

इज़हार ए मोहब्बत अब दीवाना कैसे कर पाएगा।

बेवफ़ा सनम को अब दीवाना क्या ढूंढता ही रह जाएगा।।

ऐसा लगा हो गई दूर सितमगर की मेरे अब तन्हाई।

ना जाने क्यों ए मोहब्बत नसीब ने हमेशा ही दीवाने के ठोकरे खाई।।

देखता है ओट ए दरख़्त से सनम को अपने, साथ है अब भी उनके जो साया काला, ये दीवाना।

खोद रहा है हाथो से अपने खुद कब्र जो अपनी, जो अब भी ये उनका दीवाना।।

नज़र है किस की ये कौन ताक रहा दामन से लिपट कर सनम के, सनम को हमारे।

परेशान है बहुत बेजान ये दिल ए दीवाना, दिखता है फ़रेब नज़रो में उनकी ताक रहा दामन से जो सनम के, सनम को हमारे।।

दिख रहा बेसुध हुस्न से ज़हरीला कोई नाग मदहोशी से लिपटते हुए।

जा रहा धड़कते दिल से कोई फ़ांस, ए दीवाने मेरे जो अटकते हुए।।

देखा जो नज़ारा ए बर्बादी लुटती मोहब्बत का जो अपनी ए दीवाने।

आ गया एक ज़लज़ला कोई बर्बाद ज़िन्दगी में अब जो मेरे ए दीवाने।।

नही था दामन में कोई वो सनम के साया मोहब्बत का कोई।

कर रहा था खिलवाड़ हुस्न से कोई बन के वो साया जो मोहब्बत का कोई।।

रूह से अपनी शायद इसीलिए था वो काला।

अचानक ही दीवाने ने फ़िर खुद को था जो सम्भाला।।

कर के नज़र अंदाज़ दिन ओ दुनिया वो दीवाने को।

एक दूजे से अब बेहिंतिया जो लिपटे जा रहे थे वो।।

आ कर एक दूजे के इस कदर से नज़दीक, सितम दिल ए दीवाना पर बेहिंतिया ढाह रहे थे वो।

तड़प रहा है टूटा दिल जो दीवाने का सरेराह, दिख रहा आलम ए तन्हाई जो समा एक वीराने का था वो।।

कर रहे है नज़रंदाज़ दीवाने को हर लम्हा क्यों वो?।

नही है होश ओ हब्बाश ज़माने से है अंजान क्यों वो?।।

ना जाने इस ओर क्यों उन्होंने अपना ध्यान नही दिया।

देख रहा है टूटे दिल को थामे अब भी दीवाना, फिर क्यों उन्होंने इस ओर ध्यान नही दिया।।

पड़ गई है नज़रे दीवाने पर फिर उनकी जो मदहोश अचानक से इस तरह।

लग गई है एक आग नज़रो में उनकी जो मदहोश फिर अचानक से इस तरह।।

कह रही हो मानो दीवाने से कुछ जैसे वो निगाहें उनकी जो मदहोश।

कौन हूं मैं और नही हो सकता हु मैं उनका कोई दोस्त।।

उन मदहोश निग़ाहों में उसकी अजीब सा एक एहसास था।

दीवाने को लगा फिर भी कि हा यही तो प्यार था।।

आते है खोए होश कुछ पलों के बाद नज़र जो मुझ को।

दिखती है हक़ीक़त ए मोहब्बत ज़माने में कुछ पलों के बाद जो मुझ को।।

हो गया गुनाह ये क्या वक़्त कि जो मिटती लक़ीर पर एक।

देख कर पहलो में सनम की किसी गैर को सरेराह जो एक।।

चिर दिया दिल तोड़ दी धड़कने दीवाने ने सरेआम फिर जो अपनी हर एक।

मोहब्बत की किताब पर सितम ये गुनाह जो अब हो गया फिर से एक।।

दस्तक़ दी फिर एक रोज़ ज़िन्दगी में दीवाने की जो क़यामत ने एक।

कर दिया इस कदर मज़बूर ज़िन्दगी ने दीवाने को जो संगदिल की मोहब्बत ने एक।।

तड़प के रो रही है रूह भी जिंदा जो जिस्म से, याद हर लम्हा सनम को करते हुए।

चिर रहा है दिल, तड़प रहा जो अब भी दीवाना नाम ए सनम जो लेते हुए।।

मिलते है दिल, खिलते है गुलिस्तां अब भी बर्बाद मोहब्बत के दीवाना, तन्हाई में वो।

करते है इज़हार ए मोहब्बत मिलते है जब भी बर्बाद ये गुलशन दीवाने के जो, मोहब्बत से वो।।

जान कर हाल ए दिल ये दीवाना तड़पते जा रहा हु मैं।

शायद खुद को इस तरह से नज़दीक सनम के पा रहा हु मैं।।

हाल बेहाल दीवाने का जो एक रोज़ हो गया।

थामे हुए दिल के टुकड़े टूटे नज़दीक ए सनम पहुच गया।।

गज़ब ये हाल जो टूटा दिल भी चटक कर टूट गया।

इस तरह से अब दीवाना और भी टूट कर टूट हो गया।।

ठिठक गए जो कदम ए दीवाना नज़दिक ए यार के साए से सरेराह।

सनम ए दीवाना वो दुशनम ए मोहब्ब्त लिपटा हुआ जो अब भी उनके साए से सरेराह।।

बेदर्दी वो फ़ांस ए महोब्बत का जो ज़हरीला था मेरी, साए से सनम के दीवाने को उसने जो अब घूर लिया।

लिपट गया इस क़दर से इस क़दर वो सनम से हमारे, दम ए दीवाने का जो सरेराह उसने फिर तोड़ दिया।

हक़ीक़त है बेदर्द एक शायद जो वह दिखा रहा था मुझ को इस कदर से इस तरह वो।

साथी है दिलरुबा का एक वो ही शायद यह समझा रहा था मुझको इस कदर से इस तरह वो।।

एहसास ए दीवाना अब जल्द ही सब कुछ ये महकता गुलिस्तां जो मोहब्बत का लूट जाएगा।

बेदर्द है साया जो वह काला पहलो से सनम के दे कर ज़हर एक दर्द दीवाने को तड़पाता ही जाएगा।।

भड़क गए जो जलवे ए हुस्न के बेहिंतिया से अब।

नाम ए सनम से कूद गया दीवाना जो उसमे अब।।

झुलस गए जो अरमान ए मोहब्बत ए दीवाना जो तड़प ए दिल से अब।

बग़ावत ए महोब्बत ए दीवाना जो दीवाना टकरा गए भड़कते शोलो से अब।।

हो गया लहूलुहान टूटे दिल से जो घायल धड़कनो से संगीन अपने दीवाना।

खोई मोहब्बत को अपनी इस तरह से शायद पा गए ये अपने दीवाना।।

दिखता है नक़ाब कोई फ़रेबी जो उनकी मोहब्बत का।

खेल रहा है हुस्न से उनके अक्स ए बेवफ़ाई जो उसकी मोहब्बत का।।

जानता है दीवाना हर चाल ए बेवफ़ाई जो मक्कार की मक्कारी का।

दिखता है दगा हर लम्हा ज़िन्दगी जो मक्कार की बेवफ़ाई का।।

क़यामत एक रोज़ जो सरेराह फिर बिजली कोई दिल पर टूट गई हमारे सनम के।

दर्द ए दिल दर्द ए बेवफ़ाई दर्द की इंतेहा हो गई, दर्द ए दिल दर्द ए ज़ख्म दर्द दिल पर जो हमारे सनम के।।

ख़ुशबू वो गुलाब की महकता था गुलिस्तां ए महोब्बत हर लम्हा जो महोब्बत का हमारा।

लूट कर ख़ुशबू नोच कर हर पंखुड़ी ग़ुलाब की उड़ गया वो काफ़िर उनकी, महकता था जो ग़ुलाब ए मोहब्बत का हमारा।।

जान कर दर्द महबूब का दर्द से तड़प गया ये दीवाना।

देने को सकूँ दिल को उनके दर्द जो जीते जी मर गया ये दीवाना।।

मज़बूर दिल से दीवाना दिल पर मरहम जो जख्मो पर सनम के लगाने को गया।

ज़ख्म दिल पर सनम ने फिर दीवाने को बेवफ़ा का एक इल्ज़ाम दिया।।

कर दिया क़त्ल ए दीवाना ज़हर अब भी जो उनकी नशीली निगाहों में।

तोड़ दिया दिल नफ़रत से अपनी नफ़रत अब भी जो उनकी कंटीली निग़ाहों में।।

एहसास ए दीवाना हो गया और भी जो दूर वो सनम से सनम का दीवाना।

सितम ए मोहब्बत निग़ाहों से उनकी बरसते जो अंगार, नफ़रत सनम को अब भी उससे, जो अब भी सनम का दीवाना।।

अज़ीब सी एक बेचैनी दीवाने को अब जो एक बेखुदी सी छा गई।

सोच रहा है घड़ी ये ज़िंदगानी में अब कौन सी अचानक से आ गई।।

दुत्कार दिया सरेराह अब भी गुलिस्तां ए हुस्न ने, साथ दीवाने का अपने जो नही दिया।

एहसास ए नफ़रत बेरुखी से अपनी उसने, दीवाने को अपने जिंदा ही जो मार दिया।।

ले रही है मोहब्बत भी मोहब्बत का इस कदर इम्तेहां दीवाने का क्यों?।

दे रही है ज़ख्म दिल पर इस कदर सनम, ज़ख्म दिल ए दीवाने पर क्यों।।

रोता है तड़प कर अब तन्हा रातों में ये दीवाना।
होती है नज़रे चार इत्तफाक से जब भी उनसे,
अंगार ए नफ़रत से जल जाता है उनकी के दीवाना।।

कर के ख़ाक दिल ए दीवाना अब भी जो तड़पाती है वो।
ज़हर ज़हरीली निग़ाहों से अपने बरसाकर,
वार तड़पते दिल पर कर जाती है अब भी वो।।

क़यामत है वो मदहोश नज़रे जो उनकी, कत्ल ए दीवाना हमेशा ही ज़हर बरसाती है वो।

हताश है ये समा ये लम्हा ज़िंदगानी का, आलम ए रुसवाई हमे अब बहुत तड़पाती है वो।।

दे रहा था दर्द जो कभी दामन में सनम के दुश्मन जो साया काला।

बेध दिया था तीर ए मोहब्बत से अपनी हमने, बेदर्द वो साया काला।।

ज़ोर ए वफ़ा के सामने ठहर ना पाया।

हुंकार ए मोहब्बत से वो लड़ ना पाया।।

कर रहा था खिलवाड़ हुस्न से जो साया काला।

बिखर गया था जोश ए दीवाने से घबरा के वो साया काला।।

हो के दूर दिलरुबा से दीवाने की वो।

खो गया कहि ज़िन्दगी से दीवाने की वो।।

दे रहा था जो कभी पैगाम ए मौत हमे वो साया काला।

हुस्न से दूर कहि पर वो सनम से हमारे, छट गया था वो साया काला।।

दे रहा था जो कभी दर्द ए जुदाई हमे, अपने सनम से, दूर बहुत दूर वो हम से अब हो गया था।

दे रहा था ज़ख्म ए दिल जो कभी दर्द ए तन्हाई का अंधेरा हमे, खुद ही किसी अंधेरे में वो अब खो गया था।।

दे रहा था सदा दर्द ए जहनुम जो शैतान, दूर ज़िन्दगी से वो अब हमारी हो गया था।।।

होता नही एहसास ए बेबसी सा जो अब मुझे वो।

क्या मिल गया फिर से वो सनम मेरा अब मुझे वो।।

एक रोज़ अज़ीब से हालात मालूम हुए।

देख कर हाल ए सनम ज़ख्म जो दिल के फिर से हरे हुए।।

एक रोज़ हुस्न वो सनम हमारा बेपरवाह बीच बाजार जो हो गया।

गिरा के पल्लो सरेराह वो अपना शायद कहि खो गया।।

पड़ जाता है ज़ख्म जख़्मी जो दिल पर, भर जाता है रग रग में जैसे कोई तेज़ाब।

मदहोशी का ये आलम नही, रहता है धड़कनो में मेरा सनम बन के मेरी जान।।

हो जाता है बेपरवाह हुस्न जब मदहोश कोई ज़माने में जब।

दिखलाता है राह ए मोहब्बत दीवाना फिर उसे उसका टूटे दिल के हर अफ़साने से तब।।

कर देता है खून ए जिगर वो बरसात लहू से तब उस हसीना पे जब।

जगाता है रूह ए मोहब्बत से फिर मोहब्बत को सरेराह दीवाना इस ज़माने में तब।।

मंडरा रहे थे जो प्यासे हुस्न के भंवरे जो मनचले बेसुध हुस्न ए सनम पे सरेराह ।

चिर कर दिल हर धड़कती धड़कने दर्द ए दिल जो वफ़ा, ढक देता है पर्दा ज़माने से हुस्न ए सनम पे दीवाना फिर सरेराह।।

हर दर्द जो धड़कती ये टूटती धड़कने, होश टूटती धड़कनो से दीवाने ने सनम को दिलाना चाहा।

पाक दामन को सनम के जालिम ज़माने से इस तरह रुसवाई को उसकी हर जतन से बचाना चाहा।।

पड़ी जो नज़रे दीवाने पर उनकी बेसुध, होश में तभी आ जाती है वो।

सितम ये दर्द जो दीवाने का अपने, पल्लो फिर भी नही उठाती है वो।।

खड़ा था ख़ामोशी से हर शख्स जो वहाँ, पीए जा रहा था अब भी घुट घुट हुस्न ए शबाब क़ाफ़िर निग़ाहों से जो मदहोश हुस्न के जाम।

ज़ख्म ए जिगर वो लहू था दीवाने का जो वहा, जमता जा रहा था हर लम्हा देख नजारा बर्बादी का, जो नज़ारा नही था कोई ये आम।।

आते ही होश में जो बिजलियां दीवाने पर गिराती है अपने वो।

मदहोश निग़ाहों से जो जलते अंगार अब भी दीवाने पर जो बरसाती है अपने वो।।

जलाते है दिल जो नफ़रतों की दहकती आग से अपने दीवाने का सरेराह।

हो जाते है खफ़ा ना जाने क्यों देख दीवाने को अपने वो वहाँ सरेराह।।

बदला रूप जो सनम ने अपना ये दीवाना फिर सरेराह जो बदनाम हो गया।

गुनाह कर दिया क्या ऐसा जो सनम से दीवाना फिर दूर बहुत दूर हो गया।।

दूरी अब उन से एक हक़ीक़त जो बन गई।

नफ़रत अब उनकी जो जिंदगी हमारी बन गई।।

ये मान लिया दीवाने ने अब जो इस बात को।

ये जान लिया दीवाने ने अब जो इन हालात को।।

“ना हो पाएगी उनसे प्यार की अब कोई मुलाकात।

ना मिल पाएगी उनसे मोहब्बत की अब कोई सौगात।।”

तन्हा ज़िन्दगी को अपनी अब अपना मान लिया।

हक़ीक़त को ज़माने की अब जो पहचान लिया।।

दर्द ए दिल खो गया जो तन्हाइयों में, दर्द दिल मे अपने लिए ये दीवाना।

ज़ख्म ए दिल मर गया जो ज़ख्म दिल पर अपने लिए कहि वीराने में ये दीवाना।।

रहता था हर लम्हा जो अब भी उनका एक इंतजार।

छुपी थी हर धड़कनो में जो दिल की अब भी उनकी तस्वीर ए यार।

एक रोज़ अज़ीब से फिर हालात मालूम हुए।

जान कर ये बदला मौसम दीवाने पागल से हो गए।।

एहसास ए उजड़ा गुलिस्तां जो मोहब्बत का अब आबाद हो जाएगा।

हैरान ये दीवाना क्या उससे भी सनम को उसके अब प्यार हो जाएगा।।

नही सोचा था दीवाने ने कभी मोहब्बत की उनसे होगी इस तरह से कोई मुलाक़ात।

हक़ीक़त ए मोहब्बत जो ज़माने में होती है मोहब्बत पाक लौट के आती है खुद मोहब्बत करने को मोहब्बत की एक मुलाकात।।

नही सोचा था दिवाने ने कभी खुद ही आ जाएगी करने को क़रीब मोहब्बत का अपनी एक वो इज़हार।

ऐसा हुआ एहसास रुक जाएगी दिवाने की हर सांस, लम्हा वो मोहब्बत का क्या उनको भी है दिवाने से प्यार।।

एक रोज़ आ गए नज़दीक खुद ही होकर मज़बूर दिल से जो सनम हमारे।

मदहोश वो निगाहें कुछ कुछ उदास थी उनकी, टूट रही थी जो धड़कने दिल की दिल मे हमारे।।

कुछ क़रीब दीवाना गया, कुछ क़रीब वो आ गई।

वीरान ज़िन्दगानी में मानो की बहार दिवाने के आ गई।।

करने लगे सनम वो बेबाक़ मोहब्बत का फिर जो इज़हार।

एहसास ए दीवाना कुछ ऐसा हुआ कि वो क्यों चाहती है करवाना इकरार।।

वो सुर्ख ग़ुलाबी लब वो हसीन चेहरा उनका ही था।

सितम वो नाम लबो पर उस के क्यों किसी गैर का था।।

लब्जों से उसके उन वहाँ एक भयानक शोर सा था।

ना जाने उस लम्हा ये दीवाना क्यों ख़ामोश सा था।।

ए वक़्त एक रोज़ क्यों अनहोनी सी कोई हो गई।

धड़कते दिल की धड़कती धड़कने कहि फिर खो गई।।

तरसते थे सुनने को लब्ज दो लबो से उनके जो अपने लिए।

सुने थे लब्ज दो लबो से उनके जब जो अपने लिए।।

ऐसा लगा दिवाने को शायद क़यामत आ गई।

नज़दीक वक़्त से पहले शायद मौत उसकी आ गई।।

आए वो नज़दीक हमारे तो हैरत हुई।

सुन कर लबो से उनके नाम अपना हैरत हुई।।

आ गई ख़ुद क्यों वो नज़दीक हमारे, लेकर के हाथो में वो ग़ुलाब कई।

आ गई खुद ही जो नज़दीक वो हमारे, दिख रहे हाथो में उसके जो ग़ुलाब कई।।

छुपाए थे हर ग़ुलाब से उसने कांटे ज़हरीले कई हज़ार कई।

दिखा के आईना ए मोहब्बत करने लगी दिल पर हमारे वो वार पर वार कई हज़ार कई।।

कँटीले कांटो के उन ज़हरीले वार से।

बनावट के उनके उस बनावटी प्यार से।।

कर दिए जो महबूब ने टुकड़े टूटे दिल के मेरे कई हज़ार।

हर वार से कराहता है दीवाना, उसे अब भी है उनसे जो प्यार।।

दिख रही है अब भी जो मदहोश निगाहों में भड़कती नफ़रत एक जो उनकी।

दिखा रही है अक्स हक़ीक़त का जो मदहोश निग़ाहों में भड़कती नफ़रत जो उसकी।।

कह रही थी निगाहें वो मदहोश, नज़रो में उसकी ये दीवाना है बेवफ़ा और मक्कार।

भरी है हवस जो तुझ में, कर सकता है कैसे किसी हुस्न से दीवाना कभी प्यार।।

वक़्त वो यकीं अपना उन्हें कैसे दिला पाता।

सितम वो धड़कने अपनी, उन्हें कैसे सुना पाता।।

नही कसूर हुस्न वाले का कोई इसमें, वो वक़्त वो लम्हा वो समा ही बेवफ़ा निकले।

कोशिश वफ़ा दिलाने की बहुत दिवाने ने करि, वो हालात, वो मिज़ाज ए मौसम ही मग़र बेवफ़ा निकले।।

नही बर्दाश नफ़रत से उनका वो चेहरा लाल।

सितम है वो आग जहनुम की नफ़रत सा उनका वो चेहरा लाल।।

चिर कर दिल अपना दिखा दिया था हमने।

चौखट से सर अपना उनकी लगा दिया था हमने।।

इज़हार ए मोहब्बत वो किसकी जता रही है।

मदहोश निगाहों से वो एहसास नफऱत का जो दिखा रही है।।

ऐसा लगा था मानो क़त्ल वो हमारा सरेराह कर देगी।

ग़ुलाबी हाथो से अपने मार कर तमाचा धड़कने वो हमारी रोक देगी।।

रुक गई थी हर सांस उस लम्हा दीवाने की एक बार को, हक़ीक़त है।

ठहर गई थी हर बात उस लम्हा जैसे सारे जहां की एक बार को, हक़ीक़त है।।

दस्तूर ए वक़्त एक दम से हर दस्तूर ज़माने के बदल गए थे।

शवेत बादल रक्त के प्यासे हमारे एक दम से लाल हो गए थे।।

ऐसा लगा तलाश में थे हमारी ही वो।

पूछ रहे थे पता हमारा और हमे ही ढूंढ़ रहे थे वो।।

ऐसा लगा ख़ूनी आसमां से खून की हमारे बरसात हो रही थी।

बहुत दूर है अब दीवाना उनसे, शायद वो भी कहि किसी पर्दे के पीछे रो रही थी।

टूटा जो दिल, वो दिवाने का, दूर सनम से हो गया।

ना देख पाएगा, अब उन्हें दीवाना, जो कहि खो गया।।

कर दी ख़त्म हर तम्मना दिवाने ने दबाकर दिल की दिल मे ही क्यों?।

भटक रहा है तन्हा किसी वीराने में ये दीवाना अब भी क्यों?।।

खो गया उफ़ान धड़कनो से कहि महकता था दिलकश जो अरमान।

हो कर दूर दिखता नही अपने सनम से मुकदर जो जिंदगी का एक मोहब्बत, अब जो जान।।

एहसास ए दीवाना वो मदहोश निग़ाहों से बरसते नफ़रतों के शोले, खत्म ना कभी हो पाएंगे।

जल कर मर भी जाए दीवाना ए मोहब्ब्त, एक दूसरे के अब ना वो हो पाएंगे।।

कशिश है अज़ीब सी एक जो उसकी हर एक याद।

करता है हर लम्हा दीवाना जो उसको शिदत से याद।।

आता है ख़्याल ए दीवाना जो अब भी एक।

याद होगा दीवाना क्या उनको जो इनका वो एक।।

सावन कई ज़िंदगी के गुज़र गए अब।

क्या वो सनम दिवाने को अपने भूल गए अब।।

एक आह दर्द से भरी.. . खैर जो भी हो!

भुला ना पाएगा उनको ये उनका अब दीवाना।

जो करि है वफ़ा उन से आख़री दम तक वफ़ा निभाएगा उनसे उनका अब दीवाना।।

उस हुस्न वाले का अब भी आता है जब मासूम चेहरा याद।

ना जाने क्यों आँखों मे आँसू और तड़पते दिल ने जाग जाता है उनका प्यार।।

करते हुए बिछुड़े सनम को अब भी याद, जाग जाता है दिल ए दीवाना में जो उनका प्यार।

बरसता है लहू बन के अश्क़ दिवाने का, एहसास है वीरान ज़िन्दगी में ना हो पाएगा अब उनका कोई एक दीदार।।

एहसास है ये देख ना पाएगा अब उन्हें उनका दीवाना।

एहसास है ये मिल ना पाएगा अब उन्हें उनका दीवाना।।

अब भी अक्सर जो उसकी याद आ जाती है दिवाने।

ना चाहते हुए भी दिवाने को बेहिंतिया रुलाती है दिवाने।।

ऐसा क्यों लगता है कि अब भी वो दिवाने के है साथ ।

मदहोश निगाहों में लिए अपनी उसी नफ़रत के साथ।।

धड़कते दिल मे दिवाने के धडकती एक मोहब्बत के साथ।

ख़यालो में है उसका मेरे अब भी एक अधूरा दीदार।

मरते दम तक है तड़पती सांसो में सिर्फ उसका, हा उसका ही एक आखरी इंतज़ार।।

रहेगा ख़यालो में दिवाने के हमेशा ख़्याल अपने सनम का, वो अधूरा प्यार।

यकीं है कर लेगा एक रोज़ वो भी दीदार अपने सनम का, हा वो एक मुकम्मल दीदार।।

टूटी धड़कनो का हो जाएगा एक रोज़ ख़त्म ये इंतज़ार पुराना।

दिख जाएगा दिवाने को जब भी बिछुड़ा यार वो सनम पुराना।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशित तारीख़ 12/08/ 2019
समय 9:07 am

Advertisements

Published by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice)

💥Spiritual communicator, Motivational Speaker, Author, Writer, Poet And Thinker. विक्रांत राजलीवाल। (समाजिक कार्यकर्ता, कवि, शायर, नज़्मकार, ग़ज़लकार, गीतकार, व्यंग्यकार, लेखक एव नाटककार-कहानीकार-सँवादकार) 1) एहसास प्रकाशित पुस्तक (published Book) : अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक एहसास, जिसका केंद्र बिंदु हम सब के असंवेदनशील होते जा रहे सभ्य समाज पर अपनी काव्य और कविताओं के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है। Sanyog (संयोग) प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित एव ए वन मुद्रक द्वरा प्रिंटिड। प्रकाशन वर्ष जनवरी 2016. प्रकाशित मूल्य 250:00₹ मात्र। 2) My Site: Vikrant Rajliwal Url address: vikrantrajliwal.com वर्ष 2016-17 से अब तक सैकड़ो दर्दभरी नज़्म, ग़ज़ल, बहुत सी काव्य-कविताए एव कुछ व्यंग्य किस्से, कुछ एक गीतों के साथ बहुत से विस्तृत समाजिक, आध्यात्मिक एव मनोवैज्ञानिक लेखों के साथ कई प्रकार के सामाजिक एव आध्यात्मिक विचार लिख कर अपनी साइट पर प्रकाशित कर चुके है। एव दिनप्रतिदिन कॉप्के प्रेमस्वरूप नित्य नई रचनाओँ का लेखन एव प्रकाशन जारी है। एवं स्वम् की कई नज़्म कविताओं एव लेखों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके है। 3) Youtube channel: Vikrant Rajliwal पर मेरे द्वारा लिखित मेरी समस्त रचनाओँ जैसे प्रकाशित पुस्तक एहसास से अति संवेदनशील काव्य- कविताए, और मेरी निजी लेखनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित मेरी सैकड़ो नज़्म, ग़ज़ल और बहुत सी काव्य, कविताओँ एव्यंग्य किस्सों को मेरे स्वयं के स्वरों के साथ देखने और सुनने के लिए मेरे YouTube चैनल को अभी Subscribe कीजिए। 👉 आगामी रचनाएँ (Upcoming Creation's) : अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर सक्रिय अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ श्रृंखला "दास्ताँ" के अंतर्गत चौथी एवं अब तक लिखी गई अंतिम अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ "मासूम मोहब्ब्त" प्रकाशित करि जाएगी। जल्द ही अपनी ब्लॉग साइट vikranrajliwal.com पर अपनी कुछ लघु कहानियों का प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करूँगा। 👉 साथ ही मैं वर्ष 2016 से एक अत्यंत ही दर्दभरा जीवन के हर रंग को प्रस्तुत करती एक सामाजिक कहानी, एक नाटक पर कार्य कर रहा हु। 💥 इसके साथ ही शायद आप मे से बहुत से महानुभव इस बात से परिचित नही होंगे कि मैं आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल वर्ष 2003-04 से नशे से पीड़ित मासूम व्यक्तियों के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करता आ रहा हु एव स्वम भी कई प्रकार के जटिल उतार चढ़ाव के उपरांत एक शुद्ध रिकवरी को प्राप्त कर सका हु। यदि आप मुशायरे या कवि सम्मेलन के आयोजक है और आप मेरी सैकड़ो दर्दभरी नज़्म ग़ज़ल शायरी या काव्य कविताओं के द्वारा मेरे कार्यक्रम को बुक करते है तो यकीन मानिए इस प्रकार से आप अपना एक अनमोल योगदान उन मासूमो के लिए सहज ही प्रदान कर सकते है। क्योंकि मेरी कला के कार्यक्रम से होने वाली 100% कमाई नशे से पीड़ित उन गरीब एव बेबस मासूमो के इलाज लिए समर्पित होगी। जिन्होंने अपना जीवन जीने से पूर्व ही नशे के आदि बन कर बर्बाद करना शुरू कर दिया है या बर्बाद कर चुके है। 😇 समाज सेवा: स्वमसेवी नशामुक्ति कार्यक्रम के तहत नशे की गिरफ्त में फंसे नवयुवको एवं व्यक्तियों को एक स्वास्थ्य जीवन को जीने के लिए प्रेरित करता आ रहा हु। स्वमसेवी संस्थाओं एवं स्वयम से जन सम्पर्को के माध्यम द्वारा निशुल्क सेवा भाव से वर्ष 2003 से अब तक। विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। मेरासंपर्क सूत्र नीचे अंकित है। My Whatsapp no: 91+9354948135 (Translated) One service and one collaboration Hello Friends, Many of you may not be familiar with the greatness that I have been serving my self-indigenous friends Vikrant Rajliwal with selfless service for innocent people who have been suffering from intoxicants since 2003-04. After a complex fluctuation of type, I could get a pure recovery. And if you are the organizer of mushere or poet conference or you can book my program with my hundreds of painful najm ghazal shayari or poetic poems and also in your program, believe that in this way you have a valuable contribution They can easily provide for those innocent people. Because 100% earnings from my program will be dedicated to the treatment of those poor and unemployed innocent people who have started wasting or wasted by becoming addicted to drugs before living their lives. Name: Vikrant Rajliwal Published book: एहसास (a highly sensitive poetic book inspired by social and humanitarian values) published by Sanyog publication house shahdara. Which was also showcased at the Delhi World Book Fair in the same year 2016. 🎤 Upcoming creations: The story of my fourth and last nazam tales written so far. And a play, a painful story presenting every run of life. 😇 Social service: Swamsevy has been promoting the life of the youth and all the people trapped under the influence of intoxicants as a drug addiction program. Free service charges through Swamsevy institutions from 2003 till now. Thank you Vikrant Rajliwal Hometown: Delhi. The contact form is displayed below. My Whatsapp no: 91 + 9354948135 प्रिय पाठकों एव मित्रजनों, यह है अब तक का मेरे द्वारा सम्पन्न एव आगामी लेखन कार्य, जो आप सभी प्रियजनों के प्रेम एव आशीर्वाद से शीघ्र अति शीघ्र ही सम्म्प्न हो अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाएगा। आप सभी प्रियजन अपना प्रेम एव आशीर्वाद अपने रचनाकार मित्र विक्रांत राजलीवाल पर ऐसे ही बनाए रखे। धन्यवाद। विक्रांत राजलीवाल।

One thought on “🌹 एक दीवाना। (दास्ताँ के तहत दूसरी दर्द भरी दास्ताँ)

Leave a Reply