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🕯️ बेगुनाह मोहब्ब्त। (दास्ताँ के तहत तीसरी दर्दभरी दास्ताँ)

बेगुनाह मोहब्ब्त मेरी आज तक कि समस्त दास्तानों में से एक ऐसी दास्ताँ है जिसको लिखते समय मै खुद भी अपने आँसुओ को रोक ना सका था। और आज अपनी या अब यह कहना अधित उचित होगा कि आपकी अपनी इस दास्ताँ को प्रकाशित करते हुए मैं फिर से बेहद भावुक हो रहा हु।

अब आपका अधिक समय ना लेते हुए सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि… यह दास्ताँ नही कोई आम यह एहसास है उन रूहों के जिन्होंने ना जाने किस तरह मेरी कलम के द्वारा मुझ से यह दास्ताँ लिखवा दी।

उम्मीद करता हु आपको मेरी यह दर्दभरी मोहब्ब्त की दास्तां जिसको मैंने अपने अश्को से लिखा है पसन्द आए।

🕯️ बेगुनाह मोहब्ब्त।

वक़्त की चादर पर जो अब एक गुनाह हो गया।

समझा सनम को जो बेवफ़ा तो एक गुनाह हो गया।।

दिल को उस के मासूम को एक इल्ज़ाम जो हमनें दे दिया।

खुद ही मार कर दिल पर फिर ख़ंजर ख़ूनी जो दिल रो दिया।।

जिस्म से बूढ़ा अब अपने जो हो गया हूं।

झुर्रियों में अपनी अब कहि जो खो गया हूं।।

जान ना बच पाई अब कोई जो मुझ में।

तबियत भी कुछ बदहवास सी है अब जो मुझ में।।

छूटने को है बस अब जो मेरी जान।

पल भर का ही हु शायद अब जो मैं मेहमान।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

चेहरे की झुर्रियों से मेरी दिलबर की वफ़ा झलकती है।

नोच डालो तुम इन्हें, इनसे बेवफ़ाई मेरी अब झलकती है।।

गुजरते है दिन मेरे मौत के सन्नाटे में।

डर जाता है दिल मेरा इन सुनी अंधेरी रातो में।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

सिहर (काप) जाता हूं देख कर महबूब ए मोहब्ब्त का वो आईना।

दिखती नही उस में वफ़ा, बतलाता है मुझ को वो आईना।।

टूटी खटिया पे तन्हा पड़ा, अब किसे मैं ढूंढ रहा।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

तन्हा अंधेरी इन रातो में टूट कर बिजली सी मुझ पर कोई चोंध जब जाति है।

बन के साया एक मौत का कोई, अक्स अपना मुझे जब दिखा जाती है।।

कड़क के टूटी खटिया ये मेरी जैसे कर्राह जाती है और भी टूट जो जाती है।

लेते हुए नाम ए सनम एक याद आह दिल से निकल जाती है उसको शायद जो बुलाती है।।

याद सनम को करते हुए धड़कने जो जख़्मी दिल की रुक जाती है उसको शायद जो बुलाती है।।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।।

टूटी खटिया ये वीरान कोठरी तन्हा पड़ा है कब से दीवाना सनम का जो यहाँ।

कर गई बेवफ़ाई मौत भी जो ढूंढ ना पाई मुझे वहा, कब से दीवाना तन्हा पड़ा सनम का जो यहाँ।।

वफ़ा ए महबूब जो वफ़ा सनम की एक इल्ज़ाम उस पर कोई बेहूदा दीवाना हो गया।

दुपट्टे पे रेशमी जो मख़मली उसका, दाग दीवाना बेहूदा सा उस पर हो गया।।

समझा जो बेवफ़ा सनम को अपने, ए वक़्त तो ये दीवाना खुद ही बेवफ़ा हो गया।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

वो तो हर पल घुटती रही।

तन्हा जीती और मरती रही।।

हाल ये उसका जो जान ना पाया।

बेबसी ये उसकी जो अपना उसे मान ना पाया।।

सितम जो रूह पर मासूम, वार बेदर्दी से कर दिया।

खुद ही दिल हाथो से अपना, जो चिर कर रख दिया।।

दे कर वफ़ा को इल्ज़ाम बेवफ़ाई का उसकी, गुन्हेगार ये दीवाना जो उसका अब हो गया।

देख कर ये हाल अपना तड़प कर रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

जान हक़ीक़त ए सनम दीवाना जो उसे जान गया।

मासूम धड़कने वो मासूम दिल दीवाना जो उसे पहचान गया।।

ना कोई चाल ना ही कोई इल्ज़ाम उस पर अब रहा ना बाकी।

टूट गए आईने सब फ़रेबी कोई इलज़ाम कोई फ़रेब अब रहा ना बाकी।।

मज़बूरियों ने इस ज़माने की जो बेदर्द, एक दिवाने को सनम से जुदा जो कर दिया।

सितम ए दिल दिल को दिवाने के सरेराह, बेबसी ने उसकी चकनाचूर जो कर दिया।।

ढूंढता है दीवाना अब भी उसे वक़्त की किताब में।

महफूज़ है यादें अब भी उसकी जो वक़्त की किताब में।।

हो कर जुदा दीवाना अपने सनम से मिल ना पाया फिर उसे।

ढूंढता है निसान ए क़दम सनम के हर तरफ पुकारता है अब भी उसे।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया सब भी जख़्मी दिल मेरा।।

दिन वो अब भी जवानी के अपने याद आते है।

महबूब की अपने हर सौगात साथ अपने लाते है।।

धड़कनों में एक आख़री मेरे अब भी एक तम्मना है।

हर धड़कन टूटने से पहले अपनी आखरी एक दीदार सनम का अब भी चाहते है।।

याद है वो मदहोश निगाहें उनका वो क़ातिल हुस्न, जवानी के अब भी वो दिन।

बन के मोहब्ब्त फड़कती रगों में दौड़ता लहू, सनम से अपने दीवानगी के वो दिन।।

वो वक़्त वो समा वो मिज़ाज ए मौसम बेहद अज़ीब था।

वो आलम मदहोशी का हर तरफ वो गुल वो गुलिस्तां वो महकता ग़ुलाब ए मोहब्ब्त बेहद अज़ीब था।।

करता था मोहब्ब्त एक हुस्न से जो एक दीवाना, वो दस्तूर ए मोहब्ब्त वो ज़ालिम ज़माना बेहद अज़ीब था।।।

एक इंतज़ार था हर लम्हा एक हसीन का, कर दे मदहोश जो दिवाने को।

कर दे जख़्मी दिल चिर के क़ातिल निग़ाहों से अपने जो निहार कर दिवाने को।।

अंगड़ाई लेता महकता वो सनम अब भी है याद दिवाने को।

बदलती निगाहें वो लहू बरसाता आसमां अब भी है याद दिवाने को।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

याद है वक़्त वो जब…

एक रोज़ इत्तफाक एक अज़ीब सा हो गया।

टकरा गए जो एक हुस्न से तो वार धड़कते दिल पर हो गया।।

नही नादां ये इश्क़ ये दीवाना तंग एक गली से एक रोज़ जो गुजर गया।

सामना वो मदहोश हुस्न से वार शराबी निग़ाहों का दिल पर अपने जो हो गया।।

नही मिलता है फिर चैन की लूट गया ये दीवाना, एक हसीना से सरेराह टकरा जाने के बाद।

नज़र आता है फिर हर तरफ चेहरा वो उनका हसीन, क़ातिल से सरेराह अपने टकरा जाने के बाद।।

कहते है अनहोनी ज़माने में जिसे एक दिवाने से अब वो हो गई।

आता है नज़र हर तरफ चेहरा वो उसका, यकीं है मोहब्ब्त दिल ए दिवाने को अब एक हसीना से जो हो गई।।

ढूंढता है दीवाना वही हसीं समा, वो मदहोश निगाहें, वो हुस्न ए यार दुबारा।

यकीं है दीवाना पा जाएगा एक रोज़ उसे, धड़केगा ये दिल ए दीवाना दुबारा।।

हटा दिया रुख से अपने नक़ाब जो उन्होंने सरेराह भरे बाजार ।

कर दिया जख़्मी ये दिल ए दीवाना जो उन्होंने रुख से अपने हटा कर नक़ाब सरेराह भरे बाजार।।

खिल उठा जो चेहरा वो हसीन उनका, एक दूजे को करीब से देखने के बाद।

किया नज़ारा बेहिंतिया मोहब्ब्त का उन्होंने, भर के नज़रो में मोहब्ब्त एक दूजे को देखने के बाद।।

भर कर मदहोश निग़ाहों में बेहिंतिया मोहब्ब्त दिवाने को उन्होंने क्यों देख लिया।

कर दिया वार धड़कनों पर मेरे, जख्म दिल पर देकर सरेराह जो उन्होंने मुझे लूट लिया।।

दिल की किताब के पन्नों पे हुस्न का गुलाबी नाम लिख दिया।

हुई जो नज़रे चार सरेराह उनसे, धड़कते दिल को थामे दिवाने ने उनसे उनका नाम पूछ लिया।।

उस दिलबर का जो अब बुरा हाल हो गया।

उसका भी जीना जो अब दुशवार हो गया।।

आए वो करीब हमारे तो उनको भी हम से प्यार हो गया।

देखा जो नज़रो में नज़रो के एक दूजे के इज़हार ए प्यार हो गया।।

नही मिलता है आराम धड़कनो को मेरी अब क्यों?।

नही रहता है सकूँ सांसो में मेरी अब क्यों?।।

ख़्याल ए सनम हर लम्हा सताता है मुझे अब क्यों?।

बेचैन ए दीवाना हर लम्हा रहता है तन्हा रातों में अब क्यों?।।

मोहब्ब्त जब खुद मुझ पर महरबान हो गई।

वीरान दुनिया ये मेरी अब गुलज़ार हो गई।।

रहता है ख्याल ए सनम इस दिल मे जो मेरे, ना जाने क्यों एक हसीना वो मुझ पर महरबान हो गई।।।

खिलते है गुल बागों में अक्सर, हुस्न से इश्क की वहा जब मुलाक़ात होती है।

देखते है मदहोशी से निग़ाहों में मदहोश उनकी जब, बिन बोले ही अक्सर वहा फिर बात होती है।।

सादगी से अपनी हुस्न वो अंजान सा लगता है।

नज़दिक से कर दीदार ए जलवा ए हुस्न हाल बेहाल सा दिवाने का लगता है।।

सितमगर से एक अक्सर नज़रे चार होती है।

जख़्मी ये दिल वार धड़कनो पर जब मुलाक़ात उनसे होती है।।

तन्हा थे जो लम्हे कभी ज़िन्दगी ये दिवाने की हसीं वादिया महक महकती मोहब्ब्त के बन गई।

बेनाम थी जो धड़कने कभी ज़िन्दगी ये दिवाने की एक नाम वो नाम ए सनम नाम जो उनके हो गईं।।

धड़कता है दिल देख कर दिवाने का चेहरे की हसीं जो उनके वो सुर्ख लाली एक।

डरता है दिल ए दीवाना नादां सोच कर कमसिन उसे जो हसीना वो मतवाली एक।।

ज़िंदगी ये हमारी खुशनुमा और भी हो जाती है।

हसीं चेहरे की सुर्ख लाली देख हमारी धड़कने जब बढ़ जाती है।।

दे कर दिवाने को क़ातिल जब मुस्कुराहट एक झलक देख लेती है वो।

धड़कते दिल की धड़कती हर धड़कनो को हमारी धड़का और भी देती है वो।।

भर के मदहोश निगाहों में अपनी बेहिंतिया मोहब्ब्त वो।

दे कर ज़ख्म दिल और जख़्मी दिल ए दीवाना कर देती है वो।।

राह ए मोहब्ब्त सुने थे दिवाने ने किस्से जो कई हज़ार।

हो गए फ़ना जो जल कर परवाने हुस्न पर उनकी उन मज़ारों पर हर बार।।

ऐसा क्यों लगता है मोहब्ब्त ये दिवाने को भी जला देगी।

बेवफ़ाई जो करि उन्होंने तो मुझ को भी रुला देगी।।

मलिका ए हुस्न है सनम वो मेरा, ये जानता है दीवाना।

कतार है दीवानों की उसके आस पास, ये मानता है दीवाना।।

महरबान है हुस्न वो हसीना सिर्फ इश्क़ ए दीवाना पर, इस बात से नही है इश्क़ ये अनजान।

दे देगा मोहब्ब्त में हुस्न की इश्क़ ये अपना उनके लिए अपनी ये जान।।

लगने लगी है सितमगर वो अपनी, उसकी दुनिया रंगीन है।

मरता है सारा जहां उस पर, हर अदा से अपने वो कमसिन है।।

बिखेर देती है मदहोश निग़ाहों से देख कर, जब वो क़ातिल अपनी जो मुस्कान।

खिल जाते है गुल जमीं पर बंजर, हो जाता है हुस्न से उसके फिर वो गुलिस्तां।।

हुस्न है धड़कने हर किसी की और उनकी जवानी है जान।

उनके ही मदमस्त हुस्न से है वीरानों यहां धड़कती जो जान।।

धड़कता है दिल सीने में जो सनम के, हर धड़कन है उसकी दिवाने की जो जान।।।

दिलाते है यकीं रख के दिल पर हर बार दिवाने के हाथ वो।

मर तो सकती है जल कर मग़र बेवफ़ाई जो ख़ंजर दिल पर दिवाने के मार नही सकती है वो।।

बदल गया मौसम बदल गई फ़िज़ाए जो मोहब्ब्त की एक रोज़।

टूटी है कड़क कर दिल पर जो बिजली दिवाने के एक रोज़।।

बदला जो रुख बहती हवाओ ने एक रोज़, जरूर कुछ बात है।

हुआ हादसा जो कहि पर एक रोज़, जरूर ये दिल यू ही नही परेशान है।।

बदला है रुख हवा का एक रोज़ जो कहि, एहसास उसका यहा हो रहा।

टूटी है डोर ए मोहब्ब्त एक रोज़ जो कहि, दर्द ए दिल उसके खिंचाव से उसका दीवाना रो रहा।।

बिजली एक रोज़ क़यामत की मुझ पर टूट गई।

धड़कते दिल की धड़कने मेरे कहि जो छूट गई।।

फट कर आसमां भी गर्ज के रो पड़ा।

डर कर मोहब्ब्त भी सरेराह मर गई।।

याद है नज़ारा अब भी वो आह से भरा।

बिना कुछ कहे ही दिल रो रहा था मेरा।।

याद है नज़ारा अब भी दर्द ए दिल जो दर्द भरा।

बिना ज़ख्म ही चिर रहा था जख़्मी दिल मेरा।।

अज़ीब सा एक वाक्या एक रोज़ जो दिवाने ने देख लिया।

सनम से करते हुए किसी गैर को मोहब्ब्त जो दिवाने ने देख लिया।।

बेवफ़ाई पर सनम की दिल को उस रोज दिवाने के हैरत हुई।

बेवफ़ा वो क्यों सनम मेरे, किसी गैर की भूल कर मुझे जो हुई।।

निकला था इश्क तो हुस्न के एक दीदार में।

कदम शोलो पर रख जलते जो उसके प्यार में।।

दहक उठे दिल मे फिर क्यों जलते शोले।

हो गए बर्फ फिर क्यों मोहब्ब्त के जलते शोले।।

हो गया जख़्मी दिल वो मेरा जो तड़प गया।

छोड़ दामन में किसी गैर के उनको फिर वो रो दिया।।

नही है अंजान एहसास ए हुस्न हर चाल ज़हरीली हुस्न की इश्क़ अब जान गया।

बेवफ़ा है हुस्न जो अपने इश्क़ से, सितम खुद पर इसे इश्क़ अब मान गया।।

दिल चिर देती है यू ही दिवाने का अब भी वो।

धड़कने तोड़ देती है फ़रेबी नज़रो में ला कर मोहब्ब्त वो।।

दिया है जला दिल इश्क़ का कर के हुस्न ने बेवफ़ाई।

दिया है रुला रूह ए मोहब्ब्त जो उसने कर के मोहब्ब्त की रुसवाई।।

नाक़ाम इश्क़ को हुस्न की मक्कारी जो अब भी दिखती है।

छुप छुप कर सितमगर किसी गैर से वो अब भी मिलती है।।

याद है…

दिखा कर जलवा ए हुस्न ने जलवा ए बेवफ़ाई, धड़कने धड़कते दिल की जब रोक दी।

ऐसा मारा तमाचा टूटे दिल पर मेरे, जीते जी ही उसने सांसे मेरी रोक दी।।

लेकर फ़रेबी मुस्कुराहट आई जब वो मेरे पास।

भर कर नज़रो में मोहब्ब्त झूठी बैठ गई वो मेरे पास।।

कर दिया जख़्मी रख के दिल पर उसमे बेवाफ़ाई से अपना जब हाथ।

कर रही है बैठ कर अब नज़दीक मेरे वो मोहब्ब्त की बात।।

तोड़ दी हर धड़कने रोक दी सब सांसे कर दिया इतना मज़बूर।

दिखता नही दिवाने को अक्स अपना, नही कोई अपना कसूर।।

लेता है बदल रूप वो हुस्न अपना।
लगा कि दाग दामन पर रौशन,
निकलती है ढक दाग को कर के रंगीन वो पर्दा अपना।।

पर्दा है महीन शराफ़त भरा, ढक नही पाता दाग दामन पर अपने बेवाफ़ाई से जो भरा।

झटक कर हाथ दिवाने का एक बेवफ़ा ने सरेराह, मज़ाक मोहब्ब्त का सरे अंजुमन जो उड़ा दिया।।

बेवफ़ा सनम से मुलाक़ात अब भी जो हो रही है।

जख़्मी ये दिल ए दीवाना रूह उसकी जो रो रही है।।

लगता है हुस्न अंजान मगर इश्क़ नही अब नादां।

फ़ितरत है फ़रेबी जो उनकी इश्क़ नही अब अंजान।।

एहसास ए दीवाना सनम जो दगाबाज़ हो गए।

कर के मोहब्ब्त किसी गैर से दामन में उसके खो गए।।

ज़ख्म दिल का सहलाना हाथो से अपने नही असां।

धड़कनो से नाम एक बेवफ़ा का अपनी खुद मिटा पाना नही असां।।

लपटों से धधकती आग के दीवाने को अपने सनम ने जो छोड़ दिया।

कर के मोहब्ब्त किसी गैर से जो बेवफ़ा दिवाने से अपने, दिल दिवाने का तोड़ दिया।।

बेवाफ़ाई का बेवफ़ा सनम से इक़रार करवाना असां नही।

सितमगर का फ़रेबी दिल से उसके नाम मिटाना असां नही।।

मोहब्ब्त का अपनी उसी तरह दिवाने से करती है अब भी वो इज़हार।

भर के मदहोश निगाहों में मोहब्ब्त, दिल पर करती है दिवाने के वो वार।।

धड़कने मुस्कुराहट से अब भी एक उसकी दिवाने की बढ़ जाती है।

इठलाती चाल पर अब भी जो उसकी, सांसे दिवाने की रुक जाती है।।

खड़ा है दीवाना उसके इंतज़ार में अब भी वही।

ए वक़्त टूटे दिल मे मगर एहसास ए मोहब्ब्त कोई एहसास नही।।

बेवफ़ा सनम दिवाने से मुलाक़ात फिर भी है करती।

झूठी मोहब्ब्त से इज़हार ए मोहब्ब्त का वो है करती।।

तड़प दिल की देख कर अपनी दीवाना यह मान गया।

करता है मोहब्ब्त सनम से अब भी, आह से टूटे दिल की इस बात को मान गया।।

अंजान है हुस्न एहसास ए दीवाना जो अपनी वो बेवफ़ाई से।

परेशान है इश्क, एहसास ए हुस्न जो अंजान है वो खुद अपनी बेवफ़ाई से।।

रुला देती है आँसुओ से दिवाने को मोहब्ब्त के अपने झूठे।

तड़पा देती है दिल ए दीवाना दिखा कर मोहब्ब्त के फ़साने झूठे।।

डाल दिया है पर्दा रूह पर क्यों अपनी उसने।

रोक दी है सांसे दिखा कर फ़रेबी मोहब्ब्त क्यों अपनी उसने।।

नही पड़ता है फ़र्क कोई कर के मोहब्ब्त ज़ाहिर उनको झूठे अपने एहसासों से।

हो गया है फ़ना कब का दीवाना देख नज़दीक दिल के उन्हें फ़रेबी उनकी मोहब्ब्त से।।

जख़्मी दिल के ज़ख्म एक रोज़ जो फिर से रो दिए।

देख दामन में किसी गैर के फिर से उन्हें, टुकड़े टूटे दिल के टुकड़े टुकड़े हो गए।।

हर टुकड़े से दिल के निकल रही फ़रियाद।

तोड़ा दिल दिवाने का सनम ने अब है जो गैर के साथ।।

आईने ने मोहब्ब्त के दीवाने को फिर से जला दिया।

दिखा कर अक्स ए बेवफ़ाई सनम का, फिर से मार दिया।।

दौलत ए मोहब्ब्त से दीवाना दिखता था कभी जो शहंशाहों सा।

बेवफ़ाई ए सनम ने कर दिया कंगाल उसे दिखता है हाल ए सूरत अब उसका कोई फ़कीरी सा।।

बदल गया बदलते मौसम की तरह जो दिलबर मेरा।

मुर्झा गया गुलिस्तां पतझड़ आने से पहले ही मोहब्ब्त का मेरा।।

ए मोहब्ब्त हर बार मोहब्ब्त से इश्क जो मज़बूर हो गया।

जान बेवफ़ाई जो हक़ीक़त ए यार, कहि अंधेरे गर्द में खो गया।।

हिम्मत ए इश्क़ टूट जाती है जो बता दे वो हुस्न को।

आईना ए हक़ीक़त जो दिखा दे बेवफ़ाई उसकी जो उसको।।

यकीं है इस कदर एक दिवाने का वफ़ा ए मोहब्ब्त पर अपनी।

कर देगा इस कदर मज़बूर हुस्न को दिखा कर आईना मोहब्ब्त का वो अपनी।।

हो कर बेबस वफ़ा से कर लेगा इकरार ए दगा खुद मोहब्ब्त का सनम वो बेवफ़ा अपनी।।।

मिलते है कर के पत्थर जो एहसासो को इस दिल के अब भी एक बेवफ़ा के साथ।

करती बयां मोहब्ब्त की वो अब भी दिवाने को अपनी हर एक बात।।

अपनी मोहब्ब्त और वफ़ा उसे मोहब्ब्त की एक जिंदा मिसाल लगती है।

अश्को से भीगा दामन में मेरे फ़रेबी जब सर वो अपना रखती है।।

बदस्तूर जारी है बेवफ़ा सनम से मोहब्ब्त की मुलाकाते।

हो जाएगी फ़ना एक रोज़ मोहब्ब्त से मेरी, मोहब्ब्त की दे रही है वो सौगातें।।

सुन कर एक बेवफ़ा से वफ़ा के वो अल्फ़ाज़।

रो दिया दिल तड़प कर सुन बेवफ़ा लबो से वफ़ा के अल्फ़ाज़।।

मासूम है धड़कने जो दिल में मेरे, करती है कई संगीन सवाल।

दे दु ज़वाब हर सवाल का जो ऐसे नही थे दिवाने के हाल।।

होती है सितमगर से अपने अब भी क्यों मोहब्ब्त की ये जख़्मी मुलाक़ातें।

मिलती है दामन में बेवफ़ाई के सरेराह जो वफ़ा की ये बेचैन सौगातें।।

नही है वाकिफ़ हक़ीक़त से हुस्न वो बेवफ़ा सनम मेरा।

नही रहा नादां इश्क़ ये अब जख़्मी है जो मेरा।।

नसों में अपनी ज़हर एक बेवाफ़ाई भरा उनकी जो उतार दिया।

कर के वफ़ा बेवफ़ा से एक खुद को हमने जीते जी ही जो मार दिया।।

बेवफ़ाई से सनम की ख़ुद को जिंदा ही हमने जला दिया।

रुसवाई से मोहब्ब्त की अपनी, प्याला ज़हर का हलक से उतार दिया।।

याद आई जब उसकी तो ज़ख्मो को अपने नासूर बना दिया।

मार कर जख़्मी दिल पर ख़ंजर ख़ूनी लहू अपना बहा दिया।।

उतार कर फड़कती रगों में सीसा कोई पिंघला, दिल से नाम बेवफ़ा का मिटा दिया।।।

दिया है दाग मोहब्ब्त का, नाम ए मोहब्ब्त लबो से उसके निकलने ना अब पाए।

मज़बूर है इश्क जान हक़ीक़त अब भी नज़रो में बहुत, कहि बदनाम ना वो हो जाए।।

कसमें हज़ारो वफ़ा की हमसे, हुस्न वो बेवफ़ाई से आज भी दोहरा गया।

हर सितम झेल कर जख़्मी दिल पर हज़ारो अपने, इश्क ये फिर से आज जख़्मी होता गया।।

जलता है दिल दिवाने का एक, धड़कनो में अब जान नही।।

छूटता है दम दिवाने का एक, सांसो पर उसे अब एतबार नही।।

लगते है ज़ख्म दिल पर मगर आह अब निकलती नही।

दर्द है बेहिंतिया सांसो पर मगर चोट क्यों दिखती नही।।

मिलता है हुस्न ए यार मुस्कुरा कर अब भी आता है दिवाने के जब भी करीब।

देता है सौगात प्यार की बैठाकर एतबार से अब भी अपने करीब।।

तोड़ दिया एतबार एक बेवफ़ा ने अपने यार का क्यों?।

मार कर ख़ंजर बग़ल से ख़ूनी उस को, दम घोट दिया प्यार का क्यों?।।

यकीं मोहब्ब्त का भर कर मदहोश निग़ाहों में अपनी फ़रेबी दिल ए दीवाना तोड़ दिया।

एतबार वफ़ा का बेवफा सनम ने दिला कर हर टुकड़े को टूटे दिल के फिर बिखेर दिया।।

ऐसा लगता है खेल बर्बाद ये मोहब्ब्त का खत्म जल्द ही हो जाएगा।

दिल है फ़रेबी हुस्न का, रौशनी मोहब्ब्त से मोहब्ब्त की दीवाना जरूर उसे दिखलाएगा।।

हैरान है दीवाना, हैरानी की ये बात।

दिख रही है सूरत उसकी वो कुछ उदास।।

आई क़रीब एक रोज़ वो, सूरत कुछ उसकी उदास दिखती है।

ऐसा लगता है तबियत कुछ उसकी नासाज़ लगती है।।

पूछते है दिवाने से अपने बेवफ़ा वो सनम एक रोज़, हो गए जुदा जो हम तो क्या करोंगे।

याद करोंगे हुस्न ए यार को या कर के बदनाम हमे, किसी गैर पर मरोंगे।।

रख दिया ना जाने क्यों हाथ दिल पर बेवफ़ा उस सनम ने जख़्मी दिल जो दिवाने का।

ले रही है एतबार ए वफ़ा अब क्यों, सब कुछ लूट कर वो अपने दिवाने का।।

फ़रमाते है बेवफ़ा वो सनम मेरे वक़्त ए जुदाई भरी बातें।

पूछते है बिन सनम कट पाएँगी क्या दिवाने की तन्हा रातें।।

कहती है दिवाने से वो, जल्द ही जुदा अब शायद हो जाएंगे।

ना दिखो जो तुमको कभी, तन्हा तो नही तब हो जाओंगे।।

कसक ए मोहब्ब्त से दामन ए वफ़ा पाक कर रहे है जो।

मदहोश निग़ाहों से गिरते वो अश्क़, फ़रेबी कत्ल दिवाने का रहे है वो।।

यकीं ए दीवाना सनम वो बेवफ़ा वफ़ा गैर से कर रहे है जो।

कर के क़त्ल सुने अरमानों का सरेराह बातें जुदाई भरी कर रहे है वो।।

बात सनम कोई बेवफ़ा जुदाई की जब करने लगे।

सुर्ख गुलाबी लबो से ख़ुद हक़ीक़त अपने बयाँ करने लगे।।

दे देगा इश्क़ दिलासा फिर भी उसे।

धड़कने सुना देगा दिल चिर कर फिर भी उसे।।

दिखा कर आईना बर्बाद मोहब्ब्त का अपनी।

हर ज़ख्म से टूटे दिल के आ रही है एक आह अपनी।।

अंगार है बरस रहे जो अश्क़ बन के, नम आँखों से मेरा लहू।

इम्तेहां ए मोहब्ब्त जो हो रहा तड़प के रो रही है मेरी रूह।।

हो गया बेवफ़ा हुस्न वो, बेवफ़ाई की एक मिसाल बन गया।

बहा कर अश्क़ नम निग़ाहों से अपने, आशिक़ का अपने दिल चिर दिया।।

दे रहे है यकीं, मोहब्ब्त का एतबार बेवफ़ा सनम वो अपनी।

करता है हुस्न सिर्फ इश्क़ से मोहब्ब्त, दर्द ए जुदाई दे देगी जान वो अपनी।।

दिल चिर कर अपना दिखा सकती है वो।

हर धड़कन को रोक कर मिटा सकती है वो।।

लिख दिया टूटे दिल की जो वीरान धड़कनो पर एक नाम वो नाम ए मोहब्ब्त।

इश्क़ को हुस्न पर ना रहा फिर अब क्यों एक यकीं जो यकीं ए मोहब्ब्त।।

झेल गया ख़ंजर ए बेवफ़ाई धड़कनो से अपने, इश्क़ ए दीवाना जो नादां नही।

कर देगा रुसवा ज़माना वफ़ा ए मोहब्ब्त हमारी, अंजाम ए मोहब्ब्त ऐसा कोई नही।।

दिल बदल जाए हुस्न ए सनम जो मिज़ाज ए मौसम की तरह।

थाम के हाथ मोहब्बत किसी गैर से जो चली जाए बेवफ़ा चाल सियार की तरह।।

मोहब्ब्त है जो किसी गैर से तो हाथ उसका थाम ले।

ले रही है इम्तेहां ए दीवाना जो बेवफ़ा अब तो रब का नाम ले।।

आ रही जो खबर आग गुलिस्तां में लग गई।

मोहब्ब्त करते किसी गैर से नज़रे दिलरुबा की अपने दिवाने पर जो ठहर गई।।

उड़ गए क्यों होश ए यार जो सरेराह, मदहोश निगाह एक दम से उसकी, सन सी क्यों जो रह गई।

एहसास ए पत्थर वो एहसास ए यार, ना जाने क्यों सरेराह उनकी, पथराई निगाहें जो बरस गई।।

भीगा जो अश्को से दामन किसी गैर का उनके, आग गुलिस्तां में दिवाने के जो लग गई।।।

समझ गया दिल ए नादां ये दीवाना, वो वक़्त भी आ गया, जुदा जब हो जाएंगे।

करते है गैर से बेवफ़ा सनम जो मोहब्ब्त, ये पल उसी के अब हो कर वो रह जाएंगे।।

सदियों से है तन्हा इश्क़, बेदर्द ज़माने में जो तड़प रहा।

याद हुस्न को करते हुए, घुट घुट कर हर लम्हा जीता और मर रहा।।

देखना है अंजाम ए मोहब्ब्त, बेवफा सनम वार सीने पर कब करेंगे।

तन्हा छोड़ दिवाने को अपने, हाथ किसी गैर का सरेराह वो थाम लेंगे।।

क़यामत दिल पर बेवफ़ा के बन कर बिजली कोई टूट गई।

लिपटी थी दामन से गैर के, निंद जब उसकी उड़ गई।।

नज़रे मिली दिवाने से तो नज़रे उसकी झुक गई।

जख़्मी हो गया दिल मेरा, धड़कने जब उसकी रुक गई।।

तस्वीर ए मोहब्ब्त थी धुंधलाई सी जो, एकदम से साफ वो अब हो गई।

चली हवा तूफ़ानी सी जब, हर बात अधूरी सी जब पूरी हो गई।।

उतर गया नक़ाब ए चेहरा सूरत से जो उनकी, बिन बोले ही हर बात वहा फिर हो गई।।।

जख़्मी दिल ए दीवाना हर ज़ख्म को दिल के कुछ सकूँ मिला।

कुरेदें ज़ख्म दिल के जो हर ज़ख्म अब नासूर बना।।

तड़पती रूह दिवाने की उसको कुछ आराम मिला।

रह गई थी कब्र जो खुली उन एहसासो को अब मुक्कमल मुकाम मिला।।

झूठी महफ़िल में हुस्न की इश्क़ ए दीवाने अब कोई काम नही।

एक बेवफ़ा की मोहब्ब्त में मोहब्ब्त जो अब नीलम हुई।।

फट गए पर्दे बेवफ़ाई के महीन सब उनमे अब आराम नही।

आ गई सूरत ए यार असल नज़र, नक़ाब ए वफ़ा अब बेवफ़ाई नही।।

नही है आदि इश्क़ ये मेरा इन बेदर्द से दर्दो का दिवाने।

ना जाने सह गया सितम कैसे इन बेदर्द बेदर्दो का दिवाने।।

दिखते नही बेवफ़ा सनम कहि, बेवफ़ाई से अपनी क्या सहम गए।

गुजर गए है ना जाने मौसम कितने, रुसवाई से अपनी सितमगर कहि छुप गए।।

जानते है इश्क़ ए दीवाना है सवाल कई।

छुपे है हर सवाल ए मोहब्ब्त है मसले कई।।

हर मसाला है मोहब्ब्त दिल की गहराई से जो।

हर गहराई है राज दिल के छुपाए उन्होंने जो।।

नादां है इश्क़ हो गया जो नीलम।

कुचला गया खाई ठोकरे उसने जो सरेराम।।

फिर एक रोज़…

निकला है चाँद कहि आज किसी ओर से, एक अरसे के बाद।

दिख रहे है मासूम चेहरे पर उसके बेवफ़ाई के घिनोने जो दाग।।

रोशनी है बेनूर सी उसकी, जल रहा जो ये एतबार।।।

दर्द ए जुल्म की हो गई अब इंतेहा, हर दर्द, हर अधूरी आरज़ू एक साथ जो रो पड़े।

आ गए नज़दीक बेवफ़ा दिवाने के क्यों, झुका कर निगाहें अपनी साथ दिवाने के वो जो खड़े।।

देख रही है मदहोश निगाहों में अपनी भर कर प्यार।

तड़प रही है टूटे दिल पर दिवाने के रख कर अपना हाथ।।

उठ चुका है हर पर्दा बेवफ़ाई का चेहरे से जो उनके।

आ गई है दुबारा फिर ये कौन सा नक़ाब जो चेहरे पर उनके।।

दे रहा है हो कर बेसुध हुस्न दुहाई वफ़ा की दिवाने को तन्हाई में अपने।

ले रहा है लिपट कर नाम ए वफ़ा दिवाने से तन्हाई में अपने।।

आँखों से आँसू रुकते नही।

तड़प दिल की कुछ कम तो नही।।

लव्ज़ है मासूम से उसके, सुर्ख लबो से नज़रे क्यों हटती नही।।।

दर्द ए दिल बन कर अश्क़ मासूम निग़ाहों से शराबी जो उसकी झलक गया।

खून ए ज़िगर दिवाने का देख कर उसकी तड़प जो तड़प गया।।

आँसुओ से बेवफ़ा सनम के दर्द झलक रहे।

तड़पता दिल हर टूटती धड़कने नाम ए दीवाना ले रहे।।

सुन कर नाम ए वफ़ा लबों से बेवफा के एक, ज़ख्म ए दिल जो दिवाने के जलते रहे।

हुस्न मरता रहा इश्क तड़पता रहा, देख ये हाल ए सनम ज़ख्म दिल के रो रहे।।

मोहब्ब्त से उनकी ज़ख्म छीलते रहे, हम मरते रहे, हर लम्हा ही दिल दीवानों के जो जलते रहे।।।

रख कर टूटे दिल की टूटी धड़कनो पर हाथ अपना, दे रहे है यकीं वो।

दामन है पाक हुस्न का ए दिवाने, नही है बेवफा वो।।

नही है बेवफ़ा सनम वो, सितम दिल पर उसके हो रहा।

मज़बूर है दस्तूर ए ज़माने से टूट कर दिल उसका रो रहा।।

ना समझ बेवफ़ा सनम को अपने ए दिवाने।

ना दे इल्ज़ाम ए बेवफ़ाई दिल को उसके ए दिवाने।।

मज़बूर है ये हसीना बेदर्द से, खून के रिश्तों और मुफ़लिसी भरे अफ़साने से।।

ले कर नाम ए मोहब्ब्त ए दिवाने ये हुस्न है बदनाम।

जाता है पहलो में गैर के, रूह को उसके नही है आराम।।

मोहब्ब्त के अलावा सितम है कई इस ज़माने में ए दिवाने।

तोड़ सकती है दिल हसीना अपना, पी कर ज़हर ए रुसवाई बेदर्दी इस ज़माने में ए दिवाने।।

देख कर दामन में गैर के, ना समझ लेना तुम गैर मुझ को ए मेरे दिवाने।

जिंदा है अब भी मोहब्ब्त तुम्हारी, हर धड़कन पे है नाम ए दीवाना जो तेरा ए दिवाने।।

एहसास है जो एक गैर का, जान मुफ़लिसी ने निकाल दी कर के अपना बेदर्द वार।

साया है जो एक मौत का, लटकी है सर पर अब भी एक नंगी जो तलवार।।

सितम से मज़बूर है हसीना ये अपनो पे, नही छोड़ सकती उनका जो साथ।

निकला है बिज जो दरख़्त से एक, बन गया अब हुस्न ए शबाब जो तुम्हारा ग़ुलाब।।

कांट दु उस दरख़्त को ले कर मोहब्ब्त का अब कैसे मैं नाम।।।

याद फिर भी आए जब मेरी, चाँद आसमां पर देख लेना।

ना मिले सकूँ ए दिल जब, नाम ए बेवफ़ा सनम को अपने दे देना।।

कर देना रुसवाई इस ज़माने में, एक नाम बेवफ़ा हर जगह बेवफ़ाई से लिख देना।

हालात ख़िलाफ़ जो हो गए, जुबां से निकले ना कोई भी अल्फ़ाज़।

जल्द ही ले आएगा एक अंजान घर आंगन में मेरे बारात।।

मज़बूर है बेहिंतिया बेवफ़ा सनम को जान लेना, अलग ना उससे अब हो पाऊंगी।

हो रही हु जुदा जो अपने महबूब से, फिर से ना अब मिल पाऊंगी।।

समझ लेना तुम मुझे बेवाफ़ाई की कोई घिनोनी सौगात।

आ रही है जल्द ही आंगन में मेरे एक अजनबी की बारात।।

हो कर ओझल नज़रो से हुस्न कहि अब खो गया।

छोड़ कर तड़पता दिवाने को दूर नज़रो से हो गया।।

हाल ए दिल जान अपने सनम का, दिल ए दीवाना एक रो रहा।

समझा जो बेवफ़ा वफ़ा को उसकी, रूह ए दीवाना एक दीवाना तड़प रहा।।

आईना ए मोहब्ब्त चमक गया महबूब की सच्चाई से।

दिख रहा अक्स ए मोहब्ब्त उनकी अब वफ़ाई से।।

जान कर हक़ीक़त ए सनम तड़प गई रूह दिल भी रो रहा।

ज़ख्म बेहिंतिया पहले से थे, जख़्मी अब फिर से दिल ए दीवाना हो रहा।।

दिल है बीमार मेरा, रोग ए मोहब्ब्त जो लाइलाज़।

दर्द ए दिल की दवा जो नही, हर धड़कन भी जो सनम के नाम।।

दर्द ए दिल बीमार का एक रोज़ जो बढ़ गया।

हर नव्ज़ रुक गई और कलेजा भी जो फट गया।।

देखी जो आंगन में बारात सनम की उसके, ये दिल तड़पा बेहिंतिया और धड़कना भूल गया।

जान दर्द ए जुदाई ये दिल जो एक दिवाने का टूटा, टूटने से पहले एक आह लेना भी भूल गया।।

हो रही है आतिश बाजी आंगन से ये किस के यू ही अचानक से।

रो रहे है ज़ख्म दिल के हो कर नासूर ये किस के यू ही अचानक से।।

आंगन से उनके धुन जो शहनाई की आ रही है दर्द भरी।

टूटती धड़कने तोड़ते हुए दूर सनम को ले जा रही है दर्द भरी।।

हाल ए बेहाल है उधर भी जो सनम का, देख रही है पल पल हर लम्हा वो किस की राह।

सुनी है नज़रे उसकी, नही निकलती दिल से जो उसके आह से भरी कोई आह।।

रात है मेहंदी की सब सखिया है उसके साथ।

लब है ख़ामोश उसके, बेचैन है धड़कने करने को दिवाने से कोई बात।।

जगमगाहट है सितारों सी घर आंगन जो उसका चमक रहा।

जल रहे है फानूस हर ओर दिल से फिर भी अंधेरा झलक रहा।।

दे रही दुहाई तड़पती धड़कने दिल की होने से पहले उसकी जो विदाई।

दिख जाएगा दीवाना जरूर वो उसका होने से पहले उसकी आखरी जो विदाई।।

उठ गई डोली बुझ गई हर शमा उसके इंतज़ार की उसके साथ, आया ना दिलबर वो दिल का उसके, यार हरजाई।

दर्द ए दिल सरेराह नम आंखों से झलक गया।

बैठ गई डोली में हसीना, दीवाना भी उसका तड़प गया।।

उठी थी डोली जिस लम्हा ये आसमां, ये चाँद भी उसका लाल हो गया।

गिरी थी बिजली दिल पर जो मेरे, गर्ज कर बरसा के शोले वो भी जो रोआ फिर बरस गया।।

टूट गया दिल ए दीवाना हर धड़कन से जख्मी हो गया।

देख कर मंजर एक दिवाने की बर्बादी हर कोई वहा रो दिया।।

तन्हा छोड़ तड़पता सनम दूर कहि परदेश को चला गया।

कसमे वादे तोड़ कर सब, हर टुकड़े पर दिल के दास्ताँ ए बेवफ़ाई लिख गया।।

दिन गुजरते रहे दूर सनम से जुदाई मे।

मौसम ज़िन्दगी के बदलते रहे बेदर्द अंधेरी तन्हाई में।

बिछुड़े सनम से फिर कभी मिल ना पाया जो दीवाना।

याद सनम को करते हुए तार टूटे दिल के कभी छेड़ ना पाया फिर से दीवाना।।

रह गए जो सवाल अधूरे कई, टूटे दिल की तन्हाई में।

ढूंढ़ ना पाया जबाब उनका कोई, हर लम्हा दीवाना तन्हाई में।।

जबाब अधूरे एहसासो का अपने हर सवालों का मुमकिन अब नही।

दीदार ए यार मिल जाए वो बिछुड़ा सनम ए मोहब्ब्त मुमकिन अब नही।।

एहसास ए सनम के हर एहसास है जख़्मी अब भी दिल मे जो बाकी।

टूट गए जो तार ए मोहब्ब्त हर एहसास है अधूरा एक साया जो मौत का अभी बाकी।।

महबूब की मोहब्ब्त से जख़्मी ये दिल दिवाने का हो गया।

इंतज़ार है अब भी उसका, जान के दिल दिवाने का रो गया।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

सताती है हर लम्हा याद तेरी, जान दिवाने की निकल जाती है।

होता नही दीदार ए यार, तड़प ये तेरी दिवाने को बहुत रुलाती है।।

आती है याद दिवाने की क्या तुझ को भी ए बिछुड़े सनम, याद से दिवाने की क्या तू भी तड़प जाती है।

ले कर नाम ए दीवाना अपने दिवाने को, हर लम्हा क्या तू भी उसे बुलाती है।।

तन्हा है हर धड़कन बेशक़ से टूटे दिल की मेरे, हर धड़कन से छुपाए हु सूरत ए यार आवाज़ अब नही उन धड़कनो में कोई है।

ज़ख्म ना सिलने पाए टूटे दिल की हर जख़्मी धड़कनो के मेरे, आहट अब दिवाने को अपनी मौत की आई है।।

याद हर लम्हा बेवफ़ाई अपनी, दिल में एक तन्हाई, सुनी नज़रो में अब भी सूरत ए यार दिवाने, याद दिल मे मेरे जो उसकी समाई है।।।

देख कर ये हाल अपना तड़प के रो दिया, अब भी जख़्मी दिल मेरा, अब भी जख़्मी दिल मेरा, आहहह ए मोहब्ब्त…अब भी जख़्मी दिल मेरा।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

प्रकाशन की तिथि 14/08/2019

समय 2:45 pm

( वैसे तो मैने ताइपिंग करते हुए अत्यधिक सतर्कता बरती है फिर भी यदि कहि कोई त्रुटि हो गई हो, तो उसे जल्द ही सुधार कर पुनः रिब्लोग के द्वारा प्रकाशित कर दिया जाएगा।)Photo_1565605680338

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Published by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice)

💥Spiritual communicator, Motivational Speaker, Author, Writer, Poet And Thinker. विक्रांत राजलीवाल। (समाजिक कार्यकर्ता, कवि, शायर, नज़्मकार, ग़ज़लकार, गीतकार, व्यंग्यकार, लेखक एव नाटककार-कहानीकार-सँवादकार) 1) एहसास प्रकाशित पुस्तक (published Book) : अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक एहसास, जिसका केंद्र बिंदु हम सब के असंवेदनशील होते जा रहे सभ्य समाज पर अपनी काव्य और कविताओं के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है। Sanyog (संयोग) प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित एव ए वन मुद्रक द्वरा प्रिंटिड। प्रकाशन वर्ष जनवरी 2016. प्रकाशित मूल्य 250:00₹ मात्र। 2) My Site: Vikrant Rajliwal Url address: vikrantrajliwal.com वर्ष 2016-17 से अब तक सैकड़ो दर्दभरी नज़्म, ग़ज़ल, बहुत सी काव्य-कविताए एव कुछ व्यंग्य किस्से, कुछ एक गीतों के साथ बहुत से विस्तृत समाजिक, आध्यात्मिक एव मनोवैज्ञानिक लेखों के साथ कई प्रकार के सामाजिक एव आध्यात्मिक विचार लिख कर अपनी साइट पर प्रकाशित कर चुके है। एव दिनप्रतिदिन कॉप्के प्रेमस्वरूप नित्य नई रचनाओँ का लेखन एव प्रकाशन जारी है। एवं स्वम् की कई नज़्म कविताओं एव लेखों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके है। 3) Youtube channel: Vikrant Rajliwal पर मेरे द्वारा लिखित मेरी समस्त रचनाओँ जैसे प्रकाशित पुस्तक एहसास से अति संवेदनशील काव्य- कविताए, और मेरी निजी लेखनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित मेरी सैकड़ो नज़्म, ग़ज़ल और बहुत सी काव्य, कविताओँ एव्यंग्य किस्सों को मेरे स्वयं के स्वरों के साथ देखने और सुनने के लिए मेरे YouTube चैनल को अभी Subscribe कीजिए। 👉 आगामी रचनाएँ (Upcoming Creation's) : अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर सक्रिय अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ श्रृंखला "दास्ताँ" के अंतर्गत चौथी एवं अब तक लिखी गई अंतिम अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ "मासूम मोहब्ब्त" प्रकाशित करि जाएगी। जल्द ही अपनी ब्लॉग साइट vikranrajliwal.com पर अपनी कुछ लघु कहानियों का प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करूँगा। 👉 साथ ही मैं वर्ष 2016 से एक अत्यंत ही दर्दभरा जीवन के हर रंग को प्रस्तुत करती एक सामाजिक कहानी, एक नाटक पर कार्य कर रहा हु। 💥 इसके साथ ही शायद आप मे से बहुत से महानुभव इस बात से परिचित नही होंगे कि मैं आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल वर्ष 2003-04 से नशे से पीड़ित मासूम व्यक्तियों के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करता आ रहा हु एव स्वम भी कई प्रकार के जटिल उतार चढ़ाव के उपरांत एक शुद्ध रिकवरी को प्राप्त कर सका हु। यदि आप मुशायरे या कवि सम्मेलन के आयोजक है और आप मेरी सैकड़ो दर्दभरी नज़्म ग़ज़ल शायरी या काव्य कविताओं के द्वारा मेरे कार्यक्रम को बुक करते है तो यकीन मानिए इस प्रकार से आप अपना एक अनमोल योगदान उन मासूमो के लिए सहज ही प्रदान कर सकते है। क्योंकि मेरी कला के कार्यक्रम से होने वाली 100% कमाई नशे से पीड़ित उन गरीब एव बेबस मासूमो के इलाज लिए समर्पित होगी। जिन्होंने अपना जीवन जीने से पूर्व ही नशे के आदि बन कर बर्बाद करना शुरू कर दिया है या बर्बाद कर चुके है। 😇 समाज सेवा: स्वमसेवी नशामुक्ति कार्यक्रम के तहत नशे की गिरफ्त में फंसे नवयुवको एवं व्यक्तियों को एक स्वास्थ्य जीवन को जीने के लिए प्रेरित करता आ रहा हु। स्वमसेवी संस्थाओं एवं स्वयम से जन सम्पर्को के माध्यम द्वारा निशुल्क सेवा भाव से वर्ष 2003 से अब तक। विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। मेरासंपर्क सूत्र नीचे अंकित है। My Whatsapp no: 91+9354948135 (Translated) One service and one collaboration Hello Friends, Many of you may not be familiar with the greatness that I have been serving my self-indigenous friends Vikrant Rajliwal with selfless service for innocent people who have been suffering from intoxicants since 2003-04. After a complex fluctuation of type, I could get a pure recovery. And if you are the organizer of mushere or poet conference or you can book my program with my hundreds of painful najm ghazal shayari or poetic poems and also in your program, believe that in this way you have a valuable contribution They can easily provide for those innocent people. Because 100% earnings from my program will be dedicated to the treatment of those poor and unemployed innocent people who have started wasting or wasted by becoming addicted to drugs before living their lives. Name: Vikrant Rajliwal Published book: एहसास (a highly sensitive poetic book inspired by social and humanitarian values) published by Sanyog publication house shahdara. Which was also showcased at the Delhi World Book Fair in the same year 2016. 🎤 Upcoming creations: The story of my fourth and last nazam tales written so far. And a play, a painful story presenting every run of life. 😇 Social service: Swamsevy has been promoting the life of the youth and all the people trapped under the influence of intoxicants as a drug addiction program. Free service charges through Swamsevy institutions from 2003 till now. Thank you Vikrant Rajliwal Hometown: Delhi. The contact form is displayed below. My Whatsapp no: 91 + 9354948135 प्रिय पाठकों एव मित्रजनों, यह है अब तक का मेरे द्वारा सम्पन्न एव आगामी लेखन कार्य, जो आप सभी प्रियजनों के प्रेम एव आशीर्वाद से शीघ्र अति शीघ्र ही सम्म्प्न हो अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाएगा। आप सभी प्रियजन अपना प्रेम एव आशीर्वाद अपने रचनाकार मित्र विक्रांत राजलीवाल पर ऐसे ही बनाए रखे। धन्यवाद। विक्रांत राजलीवाल।

2 thoughts on “🕯️ बेगुनाह मोहब्ब्त। (दास्ताँ के तहत तीसरी दर्दभरी दास्ताँ)

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