सुलगते हर एहसासो से अपने सुलगता सा जा रहा हु मैं।

बिखरते हर अरमानो से अपने बिखरता सा जा रहा हु मैं।।

दिख जाता है आईना आज भी जब मुझे, बतलाता है दर्द तन्हाई का अपनी एक ख़ामोशी से मुझे।

हक़ीक़त है जो हक़ीक़त नही, हर हक़ीक़त को करता बयां एक हक़ीक़त से वो मेरी मुझे।।

एक उड़ान अधूरी उड़ना आज भी है ख्वाहिश, हर उड़ान जिंदगी की उड़ने से पहले पँछी जो कैद हो गए।

कदमो से बंधी जंजीरे, लहूलुहान सी तड़पती सांसे, ख़ामोश हर एहसास मेरे एक ख़ामोशी से जो टूट गए।।

कोई तम्मना, कोई आरज़ू अधूरी सलामत ना बचा सके जो हम।

हर बढ़ते कदम से खुद को तन्हा और तन्हा सा करते गए जो हम।।

बदलते मौसम ने बतलाया है हर बार हमें कि ए मुसाफिर समय के, दूर है बहुत काफिला तेरा अब भी बहुत जो कहि खोया हुआ।

एक उम्मीद मेरी जो एक दुआ अब भी है सलामत, राह ए हक़ीक़त से है रौशन उमीदों का मेरा जो टूटा दिया।।

अक्स ए हक़ीक़त मिटा देगा जल्द ही हर अंधेरा, दिख जाएगा मुझ को मेरा फिर से जब वो खोया काफ़िला।।।

हो कर मज़बूर खुद से सिमट जाएगी हर तन्हाइयां एक रोज़ मुझ में, मिटते हर निशां जिंदगी के जब खुद ही एक रोज़ लौट आएंगे।

कब के बिछुड़े हम खुद से ही एक रोज़ जब अचानक से टकराएंगे, हक़ीक़त है ये किस्सा, हर गम ज़िन्दगी के उस रोज मिट जाएंगे।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।

21/08/2019 at 12:05 pmFB_IMG_1509257727466

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