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💥 एक सत्य। 5 (पांचवा ब्लॉग) एक सत्य अनुभव।

अब आगे…

और मैं दरवाजा खोल देता हूँ। उस समय पुड़िया के सरूर में मुझ को ठीक से कुछ समझ में नही आ रहा था। हा फिर भी इतना अवश्य याद है कि शायद मैं दरवाज़ा खोल कर वापस उसी खिड़की के समीप आ कर खड़ा हो जाता हूं और अब भी वहा मौजूद उस पुड़िया की सुलगती सिगरेट को बुझा कर बाहर फेंक देता हूं। हा याद है उसके बाद मेरे समीप मेरे पापा के दो मित्र, जिन्हें मैं अच्छे से जानता था आ कर खड़े हो जाते है। और कुछ मुस्कुराते हुए मुझ से पूछते है कि यहाँ तो अज़ीब सा धुंआ है। इसके उत्तर में मैं भी मुस्कुरा कर उनसे सहमत हो जाता हूं।

ठीक उसी समय वह मुझ से कहते है कि आज पार्टी है विश्कि (मदरिया) पीएंगे। उनके मुंह से यह सुनते ही मेरा माथा कुछ ठनक जाता है और एक अजीब सी बैचेनी होने लगती है। पता नही क्यों? शायद मुझ को उनसे ऐसी किसी बात की कोई उम्मीद ना थी इसीलिए। फिर एक ख्याल आता है कि कहि कुछ तो गड़बड़ है पर उस समय तनिक भर भी एहसास नही हो सका कि आखिर क्या गड़बड़ हो सकती है। फिर भी अपनी उस बेचैनी को रोकते हुए मैं उनसे कहता हूं कि अंकल क्या मैं अपने पापा से बात कर लूं क्यों कि क्वाटर पर मेरे सिवाय कोई भी परिवार का सदस्य उस समय वहाँ मौजूद नही है। मेरे मुंह से इतना सुनते ही वह तुरंत पापा को मोबाइल से कॉल कर देते है और मेरे पापा भी अपनी सहमति दे देते है कि ठीक है पार्टी कर लो। उसके बाद वह मुझ को शायद जूते दिखाते हुए पूछते है कि यह किसके है उनके पास अपने नए जूते देख कर मेरा सरूर कुछ हलका हो जाता है। और मुझ को स्मरण होता है कि शायद मैं पुड़िया के सरूर में मंडी (एशिया की सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मंडी) से सीधे अपने पुलिसिया क्वाटर पर आने की बजाए अपने रक्त सम्बंधित रिश्तेदार (ताऊ जी) के घर चला गया था और वहाँ अपने नए जूते छोड़ कर एक फ़टे पुराने चिथड़े के समान जूतों को पहन कर पुड़िया के सरूर में पुलिसिया क्वाटर पर आया था। अभी मैं यह सब कुछ सोच ही रहा था कि तभी उनमे से एक अंकल कहते है कि यह अपने जूते पहन लो फिर पार्टी करते है। परन्तु मैं उनसे कहता हूं कि यह मेरे जूते नही है यह फ़टे चिथड़े वाले जूते ही मेरे है और अब चलते है पार्टी करने को, पापा ने भी इजाज़त प्रदान कर दी है। और मैं अपने उस पुलिसिया क्वाटर को लॉक लगा देता हूं। उसके उपरांत हम तीनों उस पुलिसिया क्वाटर से बाहर को निकल जाते है और लगभग 100 मीटर की दूरी पर अंकल स्कूटर को रोक देते है और एक और अंकल ( जिन्हें मैं मौसा जी कहता हूं)जो वही उस पुलिस कालोनी में रहते थे वह भी स्कूटर पर बैठ जाते है और पहले वाले अंकल स्कूटर को स्टार्ट कर गेयर लगा देते है। यह सब कुछ मुझ को अत्यंत ही अजीब सा लग रहा था परन्तु मैं खामोशी से लगभग स्कूटर की स्टेपनी के ऊपर को हो कर बैठा रहता हूं। उस समय मुझ को तनिक भर भी इस बात का एहसास नही था कि जिस पुलिस कालोनी से मेरी ढाई से तीन वर्ष की (2.5 से 3 वर्ष) बहुत सी खट्टी और मीठी यादे जुड़ी है उसको उस समय मैं अंतिम बार देख रहा हु। और जो अंकल हमें पार्टी करने के लिए ले जा रहे थे वह हमे अपने उस स्कूटर पर बैठा कर उस पुलिस कालोनी से तेज़ी से बाहर की ओर निकल जाते है।

कुछ ही समय के उपरांत हम हाइवे की रेड लाइट को पार कर बुराड़ी रोड पर आ जाते है। और मैं उसी अवस्था मे लगभग स्कूटर की आधी स्टेपनी पर किसी तरह से बैठा हुआ सोच रहा था कि यहाँ तो हमारा प्लाट है ( जिस पर हम मकान बना कर वर्तमान समय में निवास कर रहे है) शायद वही खाली प्लाट पर पार्टी है आज। परन्तु जब उनका स्कूटर तेज़ी से प्लाट के मोड़ को पीछे छोड़ते हुए आगे को निकल जाता है तब मैं सोचता हूं कि आज क्या बात है और यह किस बात की पार्टी है जिसकी इजाजत पापा ने भी प्रदान कर दी है। उस अज़ीब सी अवस्था मे उस तेज़ी से चलते हुए स्कूटर पर हम चार व्यक्ति और मैं सबसे पीछे को लगभग स्टेपनी पर बैठा हुआ यही सोच विचार कर रहा था कि तभी स्कूटर एकदम से एक खाली सुनसान सड़क के एक ओर को रुक जाता है।

शेष अगले क्रम से।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
28/08/2019 at 9:25 pm 1567006942685

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Published by Voice Of Vikrant Rajliwal ( My Writing, My Blogs & My Voice)

💥Spiritual communicator, Motivational Speaker, Author, Writer, Poet And Thinker. विक्रांत राजलीवाल। (समाजिक कार्यकर्ता, कवि, शायर, नज़्मकार, ग़ज़लकार, गीतकार, व्यंग्यकार, लेखक एव नाटककार-कहानीकार-सँवादकार) 1) एहसास प्रकाशित पुस्तक (published Book) : अत्यधिक संवेदनशील काव्य पुस्तक एहसास, जिसका केंद्र बिंदु हम सब के असंवेदनशील होते जा रहे सभ्य समाज पर अपनी काव्य और कविताओं के द्वारा एक प्रहार का प्रयास मात्र है। Sanyog (संयोग) प्रकाशन घर शहादरा द्वारा प्रकाशित एव ए वन मुद्रक द्वरा प्रिंटिड। प्रकाशन वर्ष जनवरी 2016. प्रकाशित मूल्य 250:00₹ मात्र। 2) My Site: Vikrant Rajliwal Url address: vikrantrajliwal.com वर्ष 2016-17 से अब तक सैकड़ो दर्दभरी नज़्म, ग़ज़ल, बहुत सी काव्य-कविताए एव कुछ व्यंग्य किस्से, कुछ एक गीतों के साथ बहुत से विस्तृत समाजिक, आध्यात्मिक एव मनोवैज्ञानिक लेखों के साथ कई प्रकार के सामाजिक एव आध्यात्मिक विचार लिख कर अपनी साइट पर प्रकाशित कर चुके है। एव दिनप्रतिदिन कॉप्के प्रेमस्वरूप नित्य नई रचनाओँ का लेखन एव प्रकाशन जारी है। एवं स्वम् की कई नज़्म कविताओं एव लेखों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके है। 3) Youtube channel: Vikrant Rajliwal पर मेरे द्वारा लिखित मेरी समस्त रचनाओँ जैसे प्रकाशित पुस्तक एहसास से अति संवेदनशील काव्य- कविताए, और मेरी निजी लेखनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर प्रकाशित मेरी सैकड़ो नज़्म, ग़ज़ल और बहुत सी काव्य, कविताओँ एव्यंग्य किस्सों को मेरे स्वयं के स्वरों के साथ देखने और सुनने के लिए मेरे YouTube चैनल को अभी Subscribe कीजिए। 👉 आगामी रचनाएँ (Upcoming Creation's) : अपनी ब्लॉग साइट vikrantrajliwal.com पर सक्रिय अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ श्रृंखला "दास्ताँ" के अंतर्गत चौथी एवं अब तक लिखी गई अंतिम अति विस्तृत दर्दभरी नज़्म दास्ताँ "मासूम मोहब्ब्त" प्रकाशित करि जाएगी। जल्द ही अपनी ब्लॉग साइट vikranrajliwal.com पर अपनी कुछ लघु कहानियों का प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करूँगा। 👉 साथ ही मैं वर्ष 2016 से एक अत्यंत ही दर्दभरा जीवन के हर रंग को प्रस्तुत करती एक सामाजिक कहानी, एक नाटक पर कार्य कर रहा हु। 💥 इसके साथ ही शायद आप मे से बहुत से महानुभव इस बात से परिचित नही होंगे कि मैं आपका अपना मित्र विक्रांत राजलीवाल वर्ष 2003-04 से नशे से पीड़ित मासूम व्यक्तियों के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करता आ रहा हु एव स्वम भी कई प्रकार के जटिल उतार चढ़ाव के उपरांत एक शुद्ध रिकवरी को प्राप्त कर सका हु। यदि आप मुशायरे या कवि सम्मेलन के आयोजक है और आप मेरी सैकड़ो दर्दभरी नज़्म ग़ज़ल शायरी या काव्य कविताओं के द्वारा मेरे कार्यक्रम को बुक करते है तो यकीन मानिए इस प्रकार से आप अपना एक अनमोल योगदान उन मासूमो के लिए सहज ही प्रदान कर सकते है। क्योंकि मेरी कला के कार्यक्रम से होने वाली 100% कमाई नशे से पीड़ित उन गरीब एव बेबस मासूमो के इलाज लिए समर्पित होगी। जिन्होंने अपना जीवन जीने से पूर्व ही नशे के आदि बन कर बर्बाद करना शुरू कर दिया है या बर्बाद कर चुके है। 😇 समाज सेवा: स्वमसेवी नशामुक्ति कार्यक्रम के तहत नशे की गिरफ्त में फंसे नवयुवको एवं व्यक्तियों को एक स्वास्थ्य जीवन को जीने के लिए प्रेरित करता आ रहा हु। स्वमसेवी संस्थाओं एवं स्वयम से जन सम्पर्को के माध्यम द्वारा निशुल्क सेवा भाव से वर्ष 2003 से अब तक। विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित। मेरासंपर्क सूत्र नीचे अंकित है। My Whatsapp no: 91+9354948135 (Translated) One service and one collaboration Hello Friends, Many of you may not be familiar with the greatness that I have been serving my self-indigenous friends Vikrant Rajliwal with selfless service for innocent people who have been suffering from intoxicants since 2003-04. After a complex fluctuation of type, I could get a pure recovery. And if you are the organizer of mushere or poet conference or you can book my program with my hundreds of painful najm ghazal shayari or poetic poems and also in your program, believe that in this way you have a valuable contribution They can easily provide for those innocent people. Because 100% earnings from my program will be dedicated to the treatment of those poor and unemployed innocent people who have started wasting or wasted by becoming addicted to drugs before living their lives. Name: Vikrant Rajliwal Published book: एहसास (a highly sensitive poetic book inspired by social and humanitarian values) published by Sanyog publication house shahdara. Which was also showcased at the Delhi World Book Fair in the same year 2016. 🎤 Upcoming creations: The story of my fourth and last nazam tales written so far. And a play, a painful story presenting every run of life. 😇 Social service: Swamsevy has been promoting the life of the youth and all the people trapped under the influence of intoxicants as a drug addiction program. Free service charges through Swamsevy institutions from 2003 till now. Thank you Vikrant Rajliwal Hometown: Delhi. The contact form is displayed below. My Whatsapp no: 91 + 9354948135 प्रिय पाठकों एव मित्रजनों, यह है अब तक का मेरे द्वारा सम्पन्न एव आगामी लेखन कार्य, जो आप सभी प्रियजनों के प्रेम एव आशीर्वाद से शीघ्र अति शीघ्र ही सम्म्प्न हो अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाएगा। आप सभी प्रियजन अपना प्रेम एव आशीर्वाद अपने रचनाकार मित्र विक्रांत राजलीवाल पर ऐसे ही बनाए रखे। धन्यवाद। विक्रांत राजलीवाल।

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