सत्य भृम ले जान ए पथिक, लक्ष्य स्वयं झुकते नही, पथ ए पथिक सरलता से जीवन में स्वयं तुम्हारे।

ज्ञान अज्ञान ये भाव ए पथिक, लक्ष्य स्वयं आएंगे चलकर, बांधे हाथ सरलता से निकट स्वंय तुम्हारे।।

विजय तिलक भाग्य में तुम्हारे, भृम विजय स्वयं ही मिल जाएगी, आ कर निकट सरलता से स्वयं तुम्हारे।

कर्म, कुकर्म प्रतिद्वंद्वी पथ सत्य पर विजय पराजय, भृम विजय कुकर्मो से सत्य पर होगी स्थापित स्वयं तुम्हारे।।

हो ज्ञात सत्य ए पथिक अज्ञानी, पथ कठिन ये बाधाए दिशा हर ओर, इम्तेहां जीवन के ये सरल नही।

श्वास श्वास जागृत जीवन, पग पग घायल प्राण पथिक, मात्र सोच से हो जाए साकार ये वो स्वप्न नही।।

तप, त्याग, आदर्श ये जीवन के महान, नियम, अनुशाशन ब्रह्मचर्य कर स्थापित ए पथिक जीवन मे अपने तू दिव्य ज्ञान।

कर पालन संयम, चेतन इंद्रिया, कर्म योग सबसे महान, द्वेष, मोह, माया सब मिथ्या, कर्म से हो कर्म का सिर्फ संज्ञान।।

दिव्य आत्मा, साथ परमात्मा, योग योगी का एक अनुष्ठान, अमृत वाणी, शीतल चित्त, स्थिर आत्मशांति एक वरदान।

जन्म, मृत्यु, पीड़ा, प्रसन्ता, क्षणिक लोक मृत्यु के समस्त भाव, सत्य कर्म से सत्य स्थापित, सत्य है पथिक ये दिव्य ज्ञान।।

विक्रांत राजलीवाल द्वारा लिखित।
12/09/2019 at 12:12PicsArt_09-12-12.01.52 pm

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